Wednesday, 23 October 2024

"मूछ के बाल का 100 वर्ष बाद अंतिम संस्कार"

 

    “मूछ के बाल का अंतिम संस्कार वो भी एक शताब्दी बाद”

बात सुनने में जितनी अजीब अटपटी लग रही है उतनी ही रोचक और गरिमापूर्ण है | घटना अमर सिंह राठोर के विश्व विख्यात प्रसंग से सम्बंधित है | राजपूती आन बान के लिए राजस्थान में वि. स. 1812 (1765 ई.) के आस पास नागौर परगने के हरसोलाव ठिकाने के बल्लूजी चम्पावत के अमर सिंह राठौर के प्रसंग में त्याग और बलिदान की भूमिका से जुड़े विस्मृत पृष्ठ की घटना है | आगरा के किले से राव अमर सिंह राठौर के शव को मुग़ल बादशाह के चंगुल से छुड़ाने हेतु बल्लू ने अपनी मूंछ का बाल गिरवी रखकर सेना गठित की थी | और अपने प्राणों की बलि देकर राठौर के शव घर लाने के कार्य को अंजाम दिया | बल्लू के बाद पांचवीं पीढ़ी में उसके वंशजों ने बल्लू का लिखा रुक्का और मूंछ का बाल उस साहूकार के वंशजों से लेकर कर्ज ली गई राशि ससम्मान लोटाई, और बाल का विधिवत अंतिम संस्कार कर परम्परागत तरीके से शोक मनाया |

        इस एतिहासिक प्रसंग की शुरुआत 26 जुलाई 1644 ई. को आगरा के किले से राव अमरसिंह राठौर का शव लाने की रोमांचकारी घटना से है | जिसकी एक दिन पहले शाहजहाँ ने अपने दरबार में कुछ कहासुनी के बाद राठौर की हत्या करवा दी थी | राठौर की पत्नी हाडी रानी को सती होने के लिए पति का शव चाहिए था | और शाहजहाँ के दरबार से जान पर खेलकर राठौर का शव लाने का महत्त्व पूर्ण कार्य किया बल्लू चम्पावत ने | आनन फानन में बल्लू ने 5 सौ घुड़सवारों का छोटी सी सेना जमा की | और उनका वेतन चुकाने के लिए आगरा के एक साहूकार को एक लाख रुपये में अपनी मूंछ का एक बाल रेहन में रख रुक्का लिख दिया | उदयपुर के महाराणा जगत सिंह द्वारा भेजे गए सर्वश्रेष्ठ घोड़े को लेकर चम्पावत महल में पहुँच बादशाह की अनुमति ले आगरे के किले में प्रवेश कर गया | और राठौर के शव के दर्शन के बहाने वहां पहुँच बिजली की फुर्ती से घोड़े पर शव उठाया और घोडा भगाकर किले की प्राचीर से नीचे कूद पड़ा | मुग़ल सैनिकों को सोचने का मौका भी नहीं दिया | इस रोमांचकारी घटना में स्वामिभक्त घोडा अपने प्राण दे बैठा | पर चीते सी फुर्ती से बल्लू ने अमर सिंह का शव तो अपने सैनिकों को दे हाडी रानी के पास नागौर भेज दिया | और स्वयम अपने मुट्ठी भर सैनिकों के साथ शाही सेना से उलझ पड़ा | लड़ते लड़ते बल्लू शाही सेना से घिर गया तथा मुग़ल सेना ने उसका सर धड से अलग कर दिया | अगले दिन दो राजपूती विरंग्नाएं चिताओं में जली जिसमें से एक में  यमुना किनारे आगरा में माया कंवर टाकनी बल्लू की पत्नी बल्लू चम्पावत के साथ सती हो गई | और दूसरी नागौर में जिसमे हाड़ी रानी राव अमरसिंह राठौर के साथ सती हुई | आगरा में बल्लू की छतरी के भग्नावशेष आज भी देखे जा सकते है | घोड़े की स्वामीभक्ति से अभिभूत हो मुग़ल बादशाह शाहजहाँ ने घोड़े की प्रतिमा किले के समक्ष बनवाई और बोरवास गेट का नाम अमर सिंह द्वार रखा | इतिहासकार ठा. मोहन सिंह लिखित ‘चम्पावती’ के अनुसार 1961 ई. तक घोड़े की प्रतिमा थी | जो 1968 ई. के बाद नहीं देखी गई | जो सम्भवतया पीतल की प्लेटों के लालच में लोगों ने उसे क्षतिग्रस्त कर दिया |

 आगरा के जिस साहूकार से बल्लू ने कर्जा लिया था कालांतर में उसके वंशजों की हालत कमजोर हो गई | इस वजह से ये लोग मूंछ के बाल वाली डिबिया और वो बल्लू का लिखा रुक्का लेकर नागौर के हरसोलाव ठिकाने पर गए | बल्लू चम्पावत की पांचवी पीढ़ी के सूरत सिंह ने अत्यंत श्रधा से उस बाल को ग्रहण किया | तथा उसका अंतिम संस्कार कर 12 दिन तक परिवार ने शोक रखा | सूरत सिंह महाराजा विजय सिंह के समय जोधपुर के किलेदार भी रहे | तब उन्होंने पंचायत बिठाकर साहूकार के वंशजों को मूलधन का एक लाख रूपया ससम्मान लोटाया | इस सन्दर्भ में एक सोरठा भी प्रचलित है -----

“कमध बलू मुख केरन, महयत गेहने में लियो | सो ली नी सुरते स, एक लाख द्रव आपणे ||” 

अमरसिंह ने जब शाहजहाँ के सामने ही भरे दरबार में उसके साले सलावत खान की हत्या कर दी तब शाहजहाँ भागकर पीछे अपने जनानखाने में छुप गया था | तो एक सेवक ने कहा की महाराज अमरसिंह तो यहाँ भी आ सकता है | तो शाहजहाँ ने कहा था की ये राजपूत है अपनी आन के पक्के है | जनानखाने में नहीं आयेंगे | इसपर एक कवि ने शाहजहाँ की मनोदशा पर लिखा है |  

“सवा सेर लोहे से हिलाई सारी बादशाहत,

   होती जो शमशीर तो छीन लेते आगरा |”

  अमरसिंह से डरकर शाहजहाँ जनानखाने की एक कोठरी में छुप गया था |

लेखक :- शीलेन्द्र कुमार चौहान, विहिप मेरठ प्रान्त मेरठ |