“कलियुग का भागीरथ –- दशरथ मांझी”
अपने पुरखों , राजा सगर के ६० हजार भस्मीभूत
पुत्रो की तृप्ति हेतु सतयुग में राजा भगीरथ पृथ्वी पर गंगा को लाए थे | लेकिन
कलयुग में भी कोई भगीरथ ऐसा दुरूह कार्य कर सकता है ? इसकी मिसाल है दशरथ मांझी |
जिसने ३० फुट ऊँचा पर्वत कट कर मार्ग बनाया |
दशरथ मांझी का जन्म १९३४ में एक गरीबतम दलित
परिवार में बिहार के गया जिले के गहलोर गांव में हुआ था | इस गांव में पीने का
पानी उपलब्ध न होने के कारण गहलोर पर्वत पार कर पानी लाना पडता था | एक दिन पानी
लाते समय दशरथ की पत्नी फगुनी गिर पड़ी और घायल हो गयी तथा घड़ा भी फूट गया | यहीं
से दशरथ के मन में कुछ अद्भुत करने का भूत सवार हो गया | और १९६६ की एक सुबह छेनी
हथोड़ा लेकर गहलोर पहाड पर चढ गया दशरथ | किसी ने पागल कहा ,किसी ने सनकी पर इन सब
बातों से बेपरवाह ये मजबूत इरादों का धनी लगा रहा अपने ध्येय को प्राप्त करने को ये
पागल | भाग्य की विडम्बना भी देखिये इस बीच धन के आभाव में बीमारी के चलते इनकी
पत्नी की मोत हो जाती है , बेटा भगीरथ विकलांग होता है , पुत्रवधू बसंती भी विकलांग आती है | सन १९८८
बाइस वर्ष बाद दुनिया ने पहाड को अदने से आदमी के आगे झुकता देखा | दशरथ ने अकेले
अपने दम पर ३० फूट ऊँचा ,२५ फूट चोडा ,३६० फूट लंबा मार्ग गह्लोर पर्वत के आर पार
बना दिया | यह कार्य सरकारी तरीके से ५ वर्षों में २५ लाख रुपये से ज्यादा में
होता | ये मार्ग बनने से वजीरगंज और अतरी प्रखंडो के बीच की दूरी ८० किलोमीटर से १३ किलोमीटर हो गयी है |
सवाल ये है कि दशरथ को तो इस सब के बदले बहुत
कुछ मिला होगा – इंदिरा आवास नहीं , वृधा पेंशन नहीं , विकलांग पेंशन नहीं , कोई
शील्ड , तमगा , प्रशस्ति पत्र नहीं | स्वास्थ्य , शिक्षा , पेयजल , नरेगा कुछ नहीं
| और तो और उस मार्ग को सरकार ने पक्का करने कि भी जरूरत नहीं समझी | तो फिर सरकार
ने क्या दिया त्रासदी , एक जमीन का टुकड़ा जिस पर मरते दम तक मुक़दमा लडने के बाद भी
कब्ज़ा नहीं मिला | इसके लिए दशरथ ने गया से दिल्ली तक रेल कि पटरी के सहारे पैदल
यात्रा भी कि और जगजीवन राम व प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी से मिले | हाँ नितीश
ने उन्हें एक दिन मु०मंत्री कि कुर्सी पर बिठाया , और मरने पर राज्य शोक का सम्मान
दिया | इस प्रकार कलियुग का भगीरथ गुमनामी के अँधेरे में खो गया | ये बेचारा कोई
सचिन , अमिताभ जैसा स्टार या कसाब , अफजल जैसा आतंकवादी थोड़े था जो साकार उसे न्यामते बख्शती |
“कौन कहता है कि आसमान में छेद नही हो सकता , तबियत
से एक पत्थर तो उछालो यारो ||”
“उड़ान पंखो से नहीं होंसलो से होती है “



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