Thursday, 3 May 2012


       “कलियुग का भागीरथ –- दशरथ मांझी”
     अपने पुरखों , राजा सगर के ६० हजार भस्मीभूत पुत्रो की तृप्ति हेतु सतयुग में राजा भगीरथ पृथ्वी पर गंगा को लाए थे | लेकिन कलयुग में भी कोई भगीरथ ऐसा दुरूह कार्य कर सकता है ? इसकी मिसाल है दशरथ मांझी | जिसने ३० फुट ऊँचा पर्वत कट कर मार्ग बनाया |
     दशरथ मांझी का जन्म १९३४ में एक गरीबतम दलित परिवार में बिहार के गया जिले के गहलोर गांव में हुआ था | इस गांव में पीने का पानी उपलब्ध न होने के कारण गहलोर पर्वत पार कर पानी लाना पडता था | एक दिन पानी लाते समय दशरथ की पत्नी फगुनी गिर पड़ी और घायल हो गयी तथा घड़ा भी फूट गया | यहीं से दशरथ के मन में कुछ अद्भुत करने का भूत सवार हो गया | और १९६६ की एक सुबह छेनी हथोड़ा लेकर गहलोर पहाड पर चढ गया दशरथ | किसी ने पागल कहा ,किसी ने सनकी पर इन सब बातों से बेपरवाह ये मजबूत इरादों का धनी लगा रहा अपने ध्येय को प्राप्त करने को ये पागल | भाग्य की विडम्बना भी देखिये इस बीच धन के आभाव में बीमारी के चलते इनकी पत्नी की मोत हो जाती है , बेटा भगीरथ विकलांग होता है  , पुत्रवधू बसंती भी विकलांग आती है | सन १९८८ बाइस वर्ष बाद दुनिया ने पहाड को अदने से आदमी के आगे झुकता देखा | दशरथ ने अकेले अपने दम पर ३० फूट ऊँचा ,२५ फूट चोडा ,३६० फूट लंबा मार्ग गह्लोर पर्वत के आर पार बना दिया | यह कार्य सरकारी तरीके से ५ वर्षों में २५ लाख रुपये से ज्यादा में होता | ये मार्ग बनने से वजीरगंज और अतरी प्रखंडो के बीच  की दूरी ८० किलोमीटर से १३ किलोमीटर हो गयी है |
       सवाल ये है कि दशरथ को तो इस सब के बदले बहुत कुछ मिला होगा – इंदिरा आवास नहीं , वृधा पेंशन नहीं , विकलांग पेंशन नहीं , कोई शील्ड , तमगा , प्रशस्ति पत्र नहीं | स्वास्थ्य , शिक्षा , पेयजल , नरेगा कुछ नहीं | और तो और उस मार्ग को सरकार ने पक्का करने कि भी जरूरत नहीं समझी | तो फिर सरकार ने क्या दिया त्रासदी , एक जमीन का टुकड़ा जिस पर मरते दम तक मुक़दमा लडने के बाद भी कब्ज़ा नहीं मिला | इसके लिए दशरथ ने गया से दिल्ली तक रेल कि पटरी के सहारे पैदल यात्रा भी कि और जगजीवन राम व  प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी से मिले | हाँ नितीश ने उन्हें एक दिन मु०मंत्री कि कुर्सी पर बिठाया , और मरने पर राज्य शोक का सम्मान दिया | इस प्रकार कलियुग का भगीरथ गुमनामी के अँधेरे में खो गया | ये बेचारा कोई सचिन , अमिताभ जैसा स्टार या कसाब , अफजल जैसा आतंकवादी  थोड़े था जो साकार उसे न्यामते बख्शती |


“कौन कहता है कि आसमान में छेद नही हो सकता ,                    तबियत से एक पत्थर तो उछालो यारो ||”
“उड़ान पंखो से नहीं होंसलो से होती है “

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