“लाल बाई – भारत की एक अमर वीरांगना”
ये तब की बात है जब उत्तरी भारत पर सिंध के क्रूर शासक अहमद शाह का शासन था |
उसके पास ही एक छोटी सी रियासत आहोर थी जिसके राजा पर्वतसिंह थे | जिनके एक अत्यंत
रूपवती कन्या लालबाई थी | लालबाई के रूप के चर्चे अहमद शाह के दरबार तक पहुंचे |
तो उसने राजा पर्वतसिंह को एक अपमानजनक और लज्जास्पद पत्र लिख भेजा कि “तुम अपनी
बेटी हमारे हवाले कर दो हम उससे निकाह कर अपनी बेगम बनायेंगे |” जबकि उसके हरम में
हजारों बेगमें पहले से थी | आहोर छोटा राज्य था सेना भी सीमित थी | फिर भी पर्वतसिंह
ने शाह को उत्तर दिया कि “यदि कोई इस बेशर्मी से तुम्हारी बहु - बेटी मांगे तो तुम
दोगे” ? उत्तर से बोखलाकर शाह ने आहोर पर आक्रमण कर दिया | कई दिनों तक चले युद्ध
में आहोर के किले कि खाद्य सामग्री समाप्त होने लगी | कोई हल निकलता नहीं दिखाई
दिया तो राजपूती सेना केसरिया बाना पहन रणक्षेत्र में अहमद शाह कि सेना पर मरने
मारने को टूट पड़ी | युद्ध में राजा पर्वतसिंह उसका भाई और पर्वतसिंह का पुत्र जी
जान से लडे पर संख्या में अति कम होने के कारण ज्यादा देर तक नही टिक पाए और खेत
रहे | अहमद शाह किले में घुस गया | तो उसे उसने देखा कि किले में ऊँची ऊँची लपटें
उठ रही हैं | किले कि सभी महिलाओं ने एक बड़ी सी चिता में कूद कर अपनी प्राणाहुति
दे दी थी | अहमद शाह आवाक और हतप्रभ रह गया | और वापस लौट गया | कुछ समय बाद अहमद
शाह को पता चला कि राजकुमारी तो जिन्दा है, और किसी राजपूत सरदार के यहाँ छुप कर
रह रही है | पता चलते ही शाह ने अपना आदमी सरदार के पास भेजा कि “यदि जान प्यारी
है तो राजकुमारी अहमद शाह को दे दे” | सरदार को बहुत क्रोध आया, पर आगे बढ़ स्वयं
लालबाई ने रोक दिया अनावश्यक खून खराबे से अब कोई फायदा नहीं | वैसे भी वो अपने
परिजनों के बलिदान से बेहद आहात थी और बदले कि भावना उसके दिमाग में घूम रही थी |
अत: लालबाई ने सरदार से कहा कि “आप मेरे कारण कोई विपत्ति मोल ना लें | तथा मुझे
शाह के पास जाने दें मै उससे निकाह को तैयार हूँ” | अब सरदार कि विवशता थी | भेजने
कि तयारी हुई | उन दिनों एक प्रथा थी कि वर पक्ष से वधु के लिए और वधु पक्ष से वर
के लिए वस्त्र आया करते थे | कहीं कहीं तो अब भी ये प्रथा है | अत: दोनों तरफ से
वस्त्र आये और उनका आदान प्रदान हुआ | निकाह हुआ | निकाह के बाद अहमद शाह लालबाई
के साथ चांदी झील के पास महल के उपरी हिस्से की बुर्जी पर चढ़कर जनता को दर्शन देने
के पहुंचा | पर तभी एक चमत्कार हुआ की अचानक अहमद शाह के शरीर से तेज चिंगारी के
साथ लपटें उठने लगी | और अहमद शाह जल उठा और कुछ कि देर में जल मरा | उधर लालबाई
ने भी बुर्जी से चांदी झील में कूदकर अपने प्राणों कि आहुति दे दी | क्या हुआ कोई
नहीं जान पाया | समाचार पूरी रियासत में फ़ैल गया | वो राजपूत सरदार समझ गया कि ये
सब उस राजपूत ललना लालबाई कि करामात है जिसने अपने प्राण देकर अपने पिता और भाई की
हत्या, तथा छीनी गई रियासत का बदला उस क्रूर लम्पट हत्यारे अहमद शाह से लिया है | आने
वाली पीढ़ियों को लालबाई ने जता दिया कि समय आने पर भारत कि बेटियां भी अपने
प्राणों कि बाजी लगाकर अहमद शाह जैसों को नरक का रास्ता दिखाने में पीछे नहीं रहती
हैं | धन्य हैं ऐसी वीरांगना |

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