Wednesday, 3 December 2014



                             कैकेयी - नायिका या खलनायिका
कैकेयी रामायण का एक महत्व पूर्ण पात्र है | इधर तो रामायण के अनुसार राम के राज्याभिषेक की तैय्यारी चल रही थी उधर कैकेयी ने पुत्रमोह के वशीभूत हो अपने पुत्र भरत के लिए राजगद्दी और राम के लिए वनवास मांग लिया | ये पुत्र मोह उसे खलनायिका बनाता है | परन्तु ये घटना काव्यगत नाटकीय अंदाज की दृष्टि ये रोचक हो सकता है | पर आज से लाखो साल पूर्व राम जैसे महापुरुष के सम्मुख ये घटना राम और कैकेयी का अवमूल्यन करती प्रतीत नहीं होती है क्या ?
कैकेय देश की राजकुमारी अश्वपति की पुत्री कैकेयी इक्ष्वाकु कुल के महाराजा दशरथ की मंझली पत्नी थी | अयोध्यापति रघुवंशी महाराजा दसरथ को जीवन के अंतिम पड़ाव में संतान प्राप्ति के लिए पुत्रेष्टि यज्ञ करना पड़ा | यज्ञ के नैवेध से दशरथ को चार पुत्र रत्न प्राप्त हुए | नैवेध के \ भाग खाने से कौशल्या को राम, \ भाग से खाने से कैकेयी को भरत, तथा \ \ दो भाग खाने से लक्ष्मण और शत्रुघ्न सुमित्रा को उत्पन्न हुए |  क्योकिं कैकेयी ने अपने हिस्से के \ से आधा यानि \ प्रेमवश सुमित्रा को दे दिया था इस प्रकार \ \ दो भाग सुमित्रा को मिले जिस कारण उस को दो पुत्र प्राप्त हुए |
ये कैकेयी ही थी जो देवासुर संग्राम में महाराजा दशरथ के साथ युद्धरत थी | देवो का साथ देने के लिए या ये कहे अधर्म पर धर्म की जय के लिए एक स्थान पर दशरथ घायल और उनका रथ क्षत विक्षत हो जाता है रथ के पहिये की कील निकल जाती है वहाँ कैकेयी अपने प्रयास से रथ को सुचारू रखती है | और दशरथ निर्बाध युद्धरत रहते हुए असुरों का संहार कर विजयश्री प्राप्त करते है | यहीं पर दशरथ कैकेयी को दो वर देते है | यहाँ पर प्रश्न ये उठता है की युद्ध में महिला नहीं जाती ना ही वो पर्यटक स्थल था फिर कैकेयी वहाँ क्या कर रही थी ? युद्ध में तो युद्ध निष्णात लोग ही जाते है कैकेयी भी वहाँ इसी नाते उपस्थित थी | और दशरथ की विजय श्री में में बराबर की भागीदार बनी | कैकेयी रणनीति निपुण थी | पहले शादियाँ भी इसी दृष्टि से की जाती थी |
 अब विचार करें अयोद्धया का तो ताड़का, मारीच, श्रुपनखा, खर - दूषण, सुबाहु, त्रिशिरा, विराध, कबंध जैसे निशाचरों के माध्यम से आसुरी शक्तियां अयोध्या के दरवाजे पर दस्तक दे रही थी | श्रीलंका में बैठा रावण भारत तक अपनी शक्तियां बढा रहा था | दैत्यों के चलते वन प्रान्तरो में ऋषि मुनियों का तप करना दूभर हो गया था | शिक्षा को गुरु विश्वामित्र के साथ जाते मार्ग में पड़े मानव अस्थियों के ढेर को देखकर राम ने पूछा था की ये मानव अस्थियाँ यहाँ कैसे तो गुरू विश्वामित्र ने बताया था की ये राक्षसों द्वारा मरे गए ऋषियों मुनियों की अस्थियाँ है, तभी राम ने भुजा उठाकर प्राण किया था की "निशिचर हीन करेहूँ महि......."|
अयोध्या के दरवाजे पर दस्तक दे रहे रावण को रोकना आवश्यक था ये अयोध्या से सेना ले जाकर संभव नहीं था | अयोध्या के आस पास निशाचरों की उपस्थिति अयोध्या के रणनीतिकारो के लिए गहन चिंता का कारण बनता जा रहा था | अत: राम को चुप चाप अयोध्या से बहार निकालना था जिसे महाराजा दसरथ कभी भी स्वीकृति देने वाले नहीं थे | ये कार्य जो कैकेई के माध्यम से अपनाया गया उसके सिवा कोई चारा नहीं था | साथ ही देव गण भी चाहते थे की राम राजतिलक के बजाय वन को जाय | “रामायण” के अयोध्या कांड में राम के राजतिलक की बेला में देवता माता सरस्वती के निहोरे कर कहते है कि हमारी विपत्ति की बेला में राम को वन भेजने का जतन करे | काफी प्रयास के बाद सरस्वती भूलोक पर आई और मंथरा की जिहवा पर बैठ उसकी मति फेर दी | आखिर क्या था देव कार्य ? उधर राम के वनगमन में राम या कौशल्या कही भी कैकेयी को दोष देते भी नहीं दिखते | राम को वनवास अयोध्या के हित में गहन मंत्रणा कक्ष में लिया गया | चूँकि कैकेई भी रणनीति निपुण थी अत: वह भी सभा में उपस्थित थी | और राम को अयोध्या से बहार निकलने का महती कार्य कैकेई को ही दिया गया | कैकेई ने इस कार्य हेतु पूर्व में महाराजा दशरथ पर किये उपकार के बदले मिले वचनों  का सहारा लिया | आज जो सब हम रामायण देखते सुनते हैं असुरों का संहार धर्म और मर्यादा की स्थापना, सब के पीछे कैकेयी का भी बहुत बड़ा योगदान है | अत: कैकेयी धन्यवाद और सराहना की पात्र है, प्रसंशनीया और वन्दनीया हैं | प्ररन्तु कथा को अतिरंजित कर कैकेई को खलनायिका बना दिया |  

Tuesday, 1 July 2014



                                        “महाराजा सुहेलदेव पासी”
सन १००१ से १०२५ तक महमूद गजनी ने सोमनाथ सहित पश्चिमी - उत्तर भारत पर १७ आक्रमण किये और जीतता चला गया १०३० में उसकी मृत्यु हो गई | गजनी के बाद इसका भांजा सालार मसूद गाजी उत्तर भारत पर क्रूर - नृशंस आक्रांता बनकर टूट पड़ा | सालार मेरठ, दिल्ली, बदायूं, बुलंदशहर और कन्नोज को रोंदता हुआ कुटिला नदी के तट पर सतरिख (सप्तर्षि तीर्थ) कि और चला जहाँ सूर्यकुंड व तपस्वियों के १०० से ऊपर गुरुकुल और आश्रम थे | इसी अंचल में एक शुद्र शासक पासवान श्रावस्ती (बहराइच) नरेश सुहेलदेव पासी द्वारा चिकित्सालय, गौशालाएं, अन्नक्षेत्र व छात्रावास संचालित थे | ऐसे समृद्ध राज्य पर सालार ने १.५ लाख कि सेना के बल पर कुदृष्टि लगा रखी थी |  सालार गाँव - गाँव और शहर – शहर लूट पाट बलात्कार, धमंतातरण और नरसंहार करता आगे बढ़ रहा था | उधर सुहेलदेव भी अनिश्चित नहीं था अत: अपने साथ अर्जुन, भिखम, कनक, कल्याण, नरुल, जगरूप, कर्ण, बीरबल, अजयपाल, श्रीपाल, हरपाल, जरखू, हरसू, देवनारायण, नरसिंह, उल्लाशंकर, गंग, रामसायते, व भाखामर आदि स्थानीय शासको को अपने पक्ष में कर लिया | सालार ने अपनी सेना फैला कर युद्ध कि रणनीति बनाई तो सुहेदेव ने भी उसी तरह सेना को कई भागों में युद्ध को उतारा | अंतिम युद्ध कुटिला नदी के तट पर हुआ जब सालार चतुराई से विशाल गो झुंडो के बीच हाथी पर चढ कर आया कि हिंदू तो धर्म भीरु है गाय पर हथियार नहीं चला  पा एगा | पर महाराजा सुहेलदेव भी कहाँ झुकने वाले थे उन्होंने चतुराई से गायों को भडका दिया | भड़क कर रणचंडी बनी गाय सालार के सैनिकों को ही मार - काट करती भागने लगी | सालार हतप्रभ रह गया | तभी महाराजा सुहेलदेव ने अपना एक शब्दभेदी  तीखा विष बुझा बाण सालार मसूद को मारा जिससे वह तुरंत वहीँ ढेर हो गया | इस मार - काट में उसकी सारी सेना भी मारी गई | यह घटना १० जून १०३४ कि है | यह इतना बड़ा हिंदू प्रतिकार था कि आने वाले २०० वर्षों तक मुश्लिम आक्रांता कि हिम्मत खैबर दर्रा पार करने कि नहीं हुई | चंद बचे खुचे सलार के सैनिको ने वहीँ सुहेल्देव कि इजाजत से सालार कि कब्र बना दी | १३३५ में फिरोजशाह तुगलक ने सूर्य कुंड को पाटकर बड़ी दरगाह बना दी | मेरठ में नौचंदी में इसी सालार कि उंगली कि मजार बाले मियां के नाम से जानी जाती है | कालांतर में स्थानीय मुसलमानों ने भ्रामक प्रचार कर क्रूर आक्रांता को हीरो बना दिया | आज सुहेलदेव तो शैतान हो गए तथा सालार मसूद गाजी पक्का पीर |
इसका सर्व प्रथम निराकरण या प्रतिकार गोस्वामी तुलसीदास ने यूँ किया –
“लही आँख कब आंधरे बाँझ पूत कब लाय | कब कोढ़ी काया लही जग बहराइच जाय ||”      
“मिली कब किस अंधे को आँख, सपूती हुई कौनसी बाँझ |
जा रहा जग बहराइच मुर्ख, कुटिल कामी  हत्यारा धूर्त ||
पड़ा खाकर सुहेल का बाण, गजनवी का भांजा सालार |
लूटकर सोमनाथ को बना, लुटेरों का नामी सरदार ||
रौंद बरन मुल्तान बदायूं ,पावन सतरिख उतरा |
बलि अली का डेढ़ लाख के,संग कुटिला तट पसरा ||  
पासवान धनुर्धर वीरों कि जात बताने आया |
मैं कबर आशिकों को माशूक की बात बताने आया ||

Monday, 30 June 2014



                                                “डोडो”
ये एक पक्षी वर्ग का थलचर जीव है यानि न उड पाने वाला पक्षी, जो कभी हिंद महासागर के छोटे से मॉरिशस द्वीप में पाया जाता था | ये प्राणी सुस्त शारीर और स्वादिष्ट मांस के कारण १७ वीं शताब्दी के समाप्त होते होते स्वयं भी समाप्त हो गया | यह कबूतर वर्ग का एक मीटर ऊँचा और लगभग २० किलो वजन का प्राणी था | द्वीप पर इसका कोई शत्रु भी नहीं था अत आलसी हो गया और रक्षा क्षमता भी खो बैठा | पैर दुर्बल और पंख कमजोर होते गए अत: उड़ने और भागने कि क्षमता भी जाती रही | ये इतना काहिल था कि मारने पर भी बचाव नहीं करता था | डोडो के समाप्ति में मानव के साथ पहुचे उसके पालतू जानवर कुत्ते, बिल्ली, चूहे, सूअर भी इसके विनाश का कारण बने | अब इसे सिर्फ मारीशस के राष्ट्रिय चिन्ह में ही देखा जा सकता है | अंतिम बार १६३८ में ब्रिटेन में देख गया था | १५ वीं शताब्दी में पुर्तगाली मारीशस द्वीप पर पहुंचे तो उन्हें ये आसान शिकार मिल गया | तथा १५०
वर्षों में मारीशस को डोडो विहीन कर दिया | एक सुन्दर प्राणी मानव कि जिह्वा कि भेंट चढ गया |
मारीशस में ही एक विशाल इमारती वृक्ष हुआ करता था | धीरे – धीरे ये पेड़ भी समाप्त होने लगा | जब ये पेड़ समाप्ति के कगार पर पहुंचा तो वैज्ञानिकों को इसकी चिंता हुई | एक अध्ययन से ज्ञात हुआ कि पेड़ ने उगना बंद कर दिया है | और कटान तो बदस्तूर जारी था | ऐसे आखिर कब तक चलता एक दिन तो पेड़ को समाप्त होना ही था | अब वैज्ञानिकों को चिंता शुरू हुई | और शोध भी कि आखिर नए वृक्ष उग क्यों नहीं पा रहे है | काफी शोध अध्ययन के बाद पता चला कि इस वृक्ष के बीज आडू कि गुठली जैसे कठोर आवरण में होते है | और सीधे धरती में डालने पर भी वर्षों वर्ष तक नहीं गलते | इस वृक्ष के बीज को डोडो बड़े चाव से खाता था या ये कहे कि ये उसका मुख्य आहार था | डोडो के पेट में जाकर एक रसायन के संपर्क में आकार गुठली का आवरण नरम पड जाता था और डोडो कि शौच में होता हुआ धरती के संपर्क में आकार कुछ दिन बाद उग आता था | ये उस वृक्ष का जीवन चक्र था | डोडो समाप्त हुआ तो ये वृक्ष भी समाप्त हो गया | बाद में वैज्ञानिकों ने आधुनिक तकनीकी के माध्यम से वही प्रक्रिया अपनाई और इस वृक्ष को उगाना शुरू हुआ | ये प्रकृति संतुलन और पर्यावरण सामंजस्य का कितना सुन्दर उदहारण था | 

Monday, 17 February 2014



                                     “संस्कृतम्”
नासा के वरिष्ठ वैज्ञानिक रिक ब्रिग्स ने १९९० में ही कह दिया था कि इस गृह यानि धरती कि एकमात्र वैज्ञानिक भाषा संस्कृत ही है | ब्रिग्स सहित तत्कालीन कम्पूटरविदो ने संस्कृत को कम्पूटर के लिए सर्वोत्तम भाषा  घोषित किया | नासा छठी और सातवीं पीढ़ी के सुपर कम्पूटर संस्कृत के आधार पर ही बना रहा है जिनके  २०२५ से २०३५ में बाजार में आने कि संभावना है | देववाणी आधारित सामान्य कम्पूटर तो जल्दी ही बाजार में आ जायेगें तब संस्कृत सीखने कि ललक दुनिया में और बढ़ेगी | यूनेस्को के अनुसार विश्व कि सभी ९७ भाषाए प्रत्यक्ष या परोक्ष संस्कृत से जुडी है, विश्व के ५२ देशों  के २५० विश्व विद्यालयों में संस्कृत पढाई जाती है |  महानतम वैज्ञानिक आइंस्टीन ने स्वीकार किया है कि अपनी वैज्ञानिक खोजों और सिद्धांतों के निर्माण में वे गीता और अन्य संस्कृत ग्रंथों को प्रेरक व मार्गदर्शक मानते है |  संस्कृत ग्रंथों में वैज्ञानिक ज्ञान का भंडार मानने वालो में नोबेल पुरुष्कार विजेता वैज्ञानिक रदरफोर्ड, श्रोडीन्जर, हाइजनबर्ग तथा परमाणु बम्ब के आविष्कारक राबर्ट ओपनहाइमर ही नहीं है ये लोग संस्कृत के गहन अध्येता भी थे | भारत के नोबेल पुरुष्कृत वैज्ञानिक डा. सी वी रमण संस्कृत को राष्ट्र भाषा बनाने के पक्षधर थे |  और  संविधान प्रारूप समिति के अध्यक्ष डा. भीमराव आंबेडकर ने तो दो कदम आगे बढकर संस्कृत को राजभाषा बनाने के लिए प्रस्ताव भी रखा था तथा लक्ष्मीकान्त मैत्रे के साथ सदन के अंदर संस्कृत में वार्ता भी कर के दिखाई थी | विश्वविद्यालय आयोग ( १९४८ – १९४९) जिसके सदस्य डा. एस राधाकृष्णन और वैज्ञानिक मेघनाद साहा जैसे प्रबुद्ध लोग शामिल थे, ने कहा था कि डिग्री स्तर पर संस्कृत कि पढाई विद्यार्थियों में आध्यात्मिकता का संचार करेगी | माध्यमिक शिक्षा आयोग (१९५२ – १९५३) ने भी हाई स्कूल व इंटरमिडीएट स्तर पर संस्कृत कि पढाई कि वकालत कि थी | संस्कृत आयोग (१९५६ – १९५७) इस अमूल्य भारतीय धरोहर को जन जन तक पहुचाने कि बात कि थी साथ ही कोठारी आयोग ने कक्षा ८ तक तीसरी  भाषा के रूप में आधुनिक भारतीय भाषाओँ (जिनमे संवैधानिक मान्यता प्राप्त संस्कृत सहित २२ भाषाए है) को रखने कि बात की थी | इस विषय पर माननीय सुप्रीम कोर्ट ने भी ४ अक्टूबर १९९४ को दिए अपने एक अहम फैसले में कहा था कि “यदि संस्कृत के अध्ययन को निरुत्साहित किया गया तो हमारी संस्कृति का श्रोत ही सूख जायेगा” | इन सब बातों को धता बताते हुए केन्द्रीय विद्यालय संगठन ने कक्षा ६ से ८ के पाठ्यक्रम में संस्कृत के विकल्प के तौर पर ४ विदेशी भाषाए जर्मन, चीनी, स्पेनिश और फ्रेंच को शामिल कर लिया | इस मूर्खतापूर्ण निर्णय को संस्कृत शिक्षक संघ दिल्ली ने हाई कोर्ट में चुनौती दी है | सी बी एस ई ने भी संस्कृत के विकल्प के तौर पर तकनिकी और रोजगार कोर्स पेश कर दिए | राजग शासन काल में मानव संसाधन मंत्री मुरली मनोहर जोशी द्वारा ‘राष्ट्रिय संस्कृत संसथान’ के माध्यम से प्रारंभ संस्कृत शिक्षकों को ५ हजार मासिक मानदेय वाली योजना ने भी दम तोड़ दिया | देश के २३ राज्यों में माध्यमिक स्तर पर संस्कृत पढाने कि व्यवस्था है पर शिक्षक अहर्ता परीक्षा (TET) में केवल ८ राज्यों में ही संस्कृत शामिल है | स्वयम को बाबासाहेब का अनुयायी बताने वाली मायावती ने अपने शासनकाल में UPTET में संस्कृत को समाप्त कर दिया था जो बाद में बहाल हुई | भारत कि आत्मा और विवेक कि वाणी – देववाणी संस्कृत पर ये आघात सीधे - सीधे भारतीयता एवं भारत के शैक्षिक – वैज्ञानिक विकास कि जड पर प्रहार है |