Sunday, 29 January 2012

बसंत पंचमी . हकीकत और भोजशाला


                  “बसंत पंचमी”
माघ शुक्ल पंचमी ,यानि बसंत पंचमी का हिंदू दर्शन में महत्वपर्ण स्थान है | ऐसी मान्यता है कि आज के दिन ज्ञान , विद्या और कला की देवी वीणावदनी माँ सरस्वती का प्राकट्य हुआ | इससे पूर्व प्रकृति निश्तब्ध , निस्तेज , मोन , अवाक और अव्यक्त थी | और प्रकृति वाणीमय हुई , तथा साथ ही शब्द , वाणी व अक्षर प्रकट हुए |  इसीलिए आज के दिन ही सरस्वती पूजा का प्रचलन हुआ | आम धारना है की ये बसंत पंचमी की शुरुआत है परन्तु वास्तव में तो बसंत पंचमी ४० दिन बाद चैत्र मास से शुरू होती है | चूँकि बसंत ऋतुराज है अत; उसके आगमन की पूर्व सूचना का पर्व बसंत पंचमी है | एक अनोखी बात ये भी है प्रक्रति कि चितेरे कवि “सूर्यकान्त त्रिपाठी निराला “का जन्म भी आज के दिन २८ फरवरी १८९९ को हुआ | काशी हिंदू विश्वविद्यालय की स्थापना भी १९१६ में मालवीय जी ने बसंत पंचमी के दिन ही की थी | गीता में श्री कृष्ण ने कहा है की ऋतूओ में मै बसंत हूँ | आज ही के दिन पृथ्वी राज चौहान और गोरी का अंतिम युद्ध हुआ और चौहान कैद कर कंधार (अफगानिस्थान) ले जाये गए |
     आज ही के दिन को धर्मवीर हकीकत राय ने १७३४ में अपने बलिदान से अभीसिंचित कर और प्रेरणादायी बना दिया | उस अमर बलिदानी के स्मरण के बिना ये बसंत पंचमी अधूरी लगेगी | धर्मवीर हकीकत राय का जन्म १७१९ में स्यालकोट वर्तमान पकिस्तान में पिता भागमल खत्री और माँ कोरां के घर इकलोती संतान के रूप में हुआ था | तब दिल्ली पर शाह  आलम का शासन था | बालक हकीकत बचपन से ही कुशाग्र बुद्धि का होने के कारण उर्दू , फारसी और संस्कृत को शीघ्र सीख गया | इससे मदरसे के मुस्लिम बच्चे चिढ़ते थे | और एक दिन योजना बनाकर फातिमा के बहाने हकीकत को फंसा दिया और स्थिति  हकीकत की फांसी तक पहुचं गयी | फांसी के बचाव के सारे उपाय बेकार गए और हकीकत के सामने इस्लाम कबूल या फांसी में से एक को चुनने को कहा गया | तब उस १५ साल के बालक हकीकत ने कहा कि “ यदि इस्लाम कबूल करने के बाद भी मोत निश्चित है तो अपने हिंदू धर्म में ही क्यों ना मरू “ | और इस प्रकार स्यालकोट के काजी ने फांसी की सजा सुना दी | अपील करने पर लाहोर के क्रूर काजी जकरिया खान ने सजा बहाल ही रखी | और १७३४ में धर्माभिमानी वीर बालक हकीकत माँ का दिया पीला कपड़ा सर पर बांध कर हँसते – हँसते फांसी चढ़ गया | इसी  पीले कपडे की प्रेरणा से भगत सिंह आदि क्रांतिकारी “ मेरा रंग दे बसंती चोला “ गा कर फांसी चढ़ गए | इस बलिदान पर किसी कवि ने कहा था “ सर फराने वतन तुझको वतन पर नाज़ है |हकीकत का दाहसंस्कार लाहोर में होने के कारण एक समाधी लाहोर मे तथा कुछ अस्थियां लाकर दूसरी समाधी स्यालकोट में बनाई गयी | १९४७ में स्वतंत्रता के बाद स्यालकोट से मिट्टी लाकर हकीकत की ससुराल बटाला ( पंजाब भारत ) में तीसरी समाधी बनाई गयी , इस प्रकार उस अमर बलिदानी की तीन समाधी में से एक बटाला में ही श्रधा सुमन फूल चदते है | इस बालक को कोटि कोटि नमन | भारत का सबसे पहला अवज्ञा आंदोलन चलाने वाले रामसिंह कूका का जन्म भी बसंत पंचमी को हुआ था |   
                       “भोजशाला“
    बसंत पञ्चमी पर “भोजशाला” की चर्चा करना भी अनिवार्य है | क्योकि इसके बारे में बहुत कम लोगों को जानकारी है | हजारवीं शताब्दी में मध्य भारत के कलाप्रिय और प्रतापी राजा ,राजा भोज ने अपनी राजधानी धारा नगरी में माँ सरस्वती की पूजा अर्चना हेतू सन १०३४ में एक विशाल “भोजशाला” का निर्माण कराया था | ये विद्या ,ज्ञान और कला का विश्व विख्यात  केन्द्र २७० वर्षों तक अबाध अपनी कीर्ति की पताका फहराता रहा | लेकिन अयोध्या , काशी , मथुरा आदि की तरह “भोजशाला” भी मुस्लिम आक्रान्ताओ का शिकार बनी | कालांतर में लंबे बलिदान और संघर्ष के बाद हिन्दुओ को एक दिन का ही बसंत पञ्चमी की पूजा का अधिकार मिल सका | इसमें भी २००२ में मध्य प्रदेश के तत्कालीन मुख्य मंत्री दिग्विजय सिंह ने हिन्दुओ को आधे दिन की ही पूजा की अनुमति दी | आधे दिन के लिए मुसलमानों को भोजशाला में मोलाना कमाल का उर्स मनाने की अनुमति दे दी | और इस पर संघर्ष हो गया | एक वर्ष तक जागरण , आंदोलन और संघर्ष चलता रहा | अगली २००३ की बसंत पञ्चमी (६ फरवरी ) पर हिन्दु पूजा के लिए अड् गए | १९ फ़रवरी को सरकार ने गोली चला दी | २ भक्तो की मोत , ३९ घायल ,१४०० पर मुकदमा , १२ पर रासुका | स्वत्रंत भारत के इतिहास में अभूतपूर्व ढंग से ३०० लोगों पर एक करोड १६ लाख रु० का जुरमाना भी हुआ | ज्यों -ज्यों सरकार का दमन बढता गया हिन्दुओ का आन्दोलन भी उग्र से उग्रतर होता गया और  हिन्दुओ ने हार नहीं मानी | आखिर सरकार झुकी और ८ अप्रैल २००३ को ६९८ वर्षों का कलंक हटाकर विधि विधान से माँ सरस्वती की पूजा अर्चना बहाल हुई |

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