“काकोरी
कांड” ९ अगस्त
भारत के इतिहास में काकोरी कांड एक परिवर्तनकारी घटना के रूप में सदा
याद किया जाता रहेगा | इसमे क्रांतिकारियों ने दुस्साहसिक ढंग से रेल लूट कर अपने
आर्थिक खर्चो को पुरा करने के लिए सरकारी
खजाना लूटा था | इस घटना का एक अविस्मरणीय पक्ष भी है |
लखनऊ – हरदोई रेलवे लाइन के बीच एक छोटा सा अनाम सा स्टेशन है काकोरी,
इसी स्टेशन पर क्रांतिकारियो ने ८ डाउन पैसेंजर ट्रेन को ९ अगस्त १९२५ को लूटा था
| इस ट्रेन के गार्ड का नाम था जगन्नाथ प्रसाद था | लूट के समय गार्ड को जान से
मारने ओर न मारने की बहस के बीच इस शर्त पर छोड़ दिया गया था कि बाद में पकडे जाने
की स्थिति में पहचानेगा नहीं | घटना के कुछ समय बाद सभी क्रांतिकारी पकड़ लिए गए ओर
सजाएं हुईं | शचीन्द्र बख्शी सबसे बाद में पकडे गए तो उनकी जेल में पहचान परेड
कराई गयी | गार्ड ने शचीन्द्र बख्शी को पहचानने से मना कर दिया | जबकि बैटरी ओर
गार्ड के डिब्बे की रोशनी में ही खजाने की तिजोरी को तोडते हुए गार्ड ने सबको
तसल्ली से देखा था | बख्शी ने ही ईश्वर का वास्ता देकर गार्ड को जिन्दा छोडने की
ज्यादा वकालत की थी |
सन १९३८ यानि १३ वर्ष बाद ७
साल की सजा से छुट कर एक दिन शचीन्द्र बख्शी रायबरेली स्टेशन पर समाचार पत्र पढ़ रहे थे कि
पीछे से किसी ने उनकी पीठ पर हल्का सा हाथ मारते हुए पूछा कि “कहो शचीन्द्र कैसे
हो नमस्ते“ शचीन्द्र ने पीछे मुड कर देखा तो काकोरी कांड वाली ट्रेन का गार्ड जगन्नाथ
है | देखते ही बख्शी कि आँखे भर आई जेल की पहचान परेड में नहीं पहचानने वाले ने १३
वर्ष बाद पहचान लिया | भारत के स्वतंत्रता समर में काकोरी कांड का ओर काकोरी कांड
में गार्ड जगन्नाथ का अपने किस्म का अनुपमेय योगदान सदा याद रहेगा |
काकोरी कांड में (१) रामप्रसाद
बिस्मिल, (२) ठा. रोशनसिंह, (३) अशफ़ाकुल्ला खां को फांसी, (१) शचीन्द्र सान्याल, (२) शचीन्द्र बख्शी को
आजन्म कारावास (काला पानी) तथा मन्मथ नाथ को १४ साल की सजा हुई थी |


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