Sunday, 14 October 2012

“शिवाजी और उनके वंशज सदा सचेष्ट रहे मन्बिन्दुओ के लिए"



  “शिवाजी और उनके वंशज सदा सचेष्ट रहे मन्बिन्दुओ के लिए"
क्षत्रपति शिवाजी और उनके वंशज अपने मानबिन्दुओ और देवस्थानो कि रक्षा के लिए सदा प्राणपन से सचेष्ट रहे | तथा मुश्लिम आक्रान्ताओ द्वारा तोड़े गए दक्षिण के मंदिरों को मौका मिलते ही वापस प्राण प्रतिष्ठित कर पूर्व स्वरूप प्रदान किया व उत्तर के तोड़े गए मंदिरों के लिए भी सदैव सचेष्ट रहे | १७१९ में बाजीराव पेशवा ने दिल्ली की मुगलिया सल्तनत को हिला कर अपनी ताकत का अहसास करा दिया था, तथा दक्षिण के ६ सूबो की सरदेशमुखी (चौथ) वसूली का अधिकार ले लिया था | 
   औरंगजेब का पडपोता सैयद बंधुओ की कठपुतली रोशन अख्तर दिल्ली की गद्दी पर बैठा | मालवा के सूबेदार संवाई जयसिंह ने बादशाह और बाजीराव में संधि कराई जिसके तहत मालवा की भी सुबेदारी बाजीराव के पास आ गई | पर बादशाह को ये बात खलती रही और मालवा की सुबेदारी अपने पास लाने के लिए षड्यंत्र करता रहा |  १७३६ में बाजीराव ने बादशाह के सामने एक ९ सूत्रीय मांग पत्र पेश किया, जिसमे आठवीं  मांग में प्रयाग, बनारस, गया, और मथुरा के तीर्थ अपनी पेशवाई में देने को कहा | बादशाह ने उनकी एक भी मांग तो नहीं मानी पर इससे ये पता चलता है की मराठे उत्तर भारत के मंदिरों की सुरक्षा और उनकी पुनर्प्रतिष्ठा को कितना लालायित थे | 
     उज्जयनी के प्राचीनतम स्वयम्भू महाकालेश्वर मंदिर को बुरी तरह लूट कर १२३५ मे गुलामवंशीय दिल्ली शासक अल्तमश ने ध्वस्त कर शिवलिंग को पास के ही कोटितीर्थ कुंड में फैंक दिया था, तथा उस स्थान पर मस्जिद बना दी | बाजीराव पेशवा के नेतृत्व में दीवान रामचंद्र बाबा ने १७३४ से १७४५ तक ११ साल में पुनः ५०० साल पुराने इस कलंक, मस्जिद को तोड़ कर महाकालेश्वर मंदिर औरंगजेब ने अपने दक्खन अभियान के दोरान न सिर्फ तोडा बल्कि उस स्थान पर पुनर्स्थापित किया | ५२ पीठो में से एक त्रयम्बकेश्वर महादेव (नासिक) को मस्जिद भी तामीर कर दी | बाजीराव पेशवा के बेटे नानाजी पेशवा ने उस मस्जिद को गिराकर शिवलिंग की पुन: प्राणप्रतिष्ठा करायी, तथा अवंतिका के श्री महाकालेश्वर मंदिर का जीर्णोधार भी कराया |
१६७४ में शिवाजी महाराज के विधिवत क्षत्रपति सुशोभित होने पर ४ मार्च १६७७ को भाग्यनगर (हैदराबाद) के तानाशाह सुल्तान ने अपनी रियासत में शिवाजी महाराज को स्वागत भोज में आमंत्रित किया | भोजन के उपरांत सुल्तान ने शिवाजी को पानबीड़ा पेश किया तो शिवाजी महाराज ने ये कहते हुए बीड़ा अस्वीकार कर दिया कि “जब तक काशी जाकर काशी विश्वनाथ मंदिर, जिसे १८ अप्रेल १६६९ के ओरंगजेब के शाही फरमान से तोड़कर ज्ञानवापी मस्जिद बना दी गई थी, को पुन: पूर्व स्वरूप में ना लोटा लूँगा तब तक बीड़ा ग्रहण नहीं करूँगा |” शिवाजी कि इस संकल्पशीलता देखकर सुल्तान अवाक् रह गया |
 अपने विजय प्रयाण में शिवाजी हैदराबाद से आगे कर्णाटक कि ओर बढे और जिंजी का किला जीत लिया | जिंजी से वे तिरुवन्नामाले गए | वहाँ समातिरपेरुमल के दो मंदिरों को पूर्व मुस्लिम शासको द्वारा गिरा कर मस्जिद में परिवर्तित कर दिया गया था | उन दोनों मस्जिदों को शिवाजी ने १६७७ में गिरा कर मंदिरों में धार्मिक विधान से देव प्रतिमाये स्थापित कर पूजा अर्चना प्रारम्भ करायी |

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