Sunday, 16 February 2014



                                           “संत रविदास”
विदेशी और विधर्मियों के निरंतर आक्रमण से जब भारत कि धर्मप्राण जनता कि आस्था और विश्वास अपनी संस्कृति से डगमगा रहा था उस समय संत रविदास राष्ट्र रक्षा हेतु आगे आये और संघर्ष किया तथा जन मन को संजीवनी प्रदान करने हेतु संत परम्परा में अपना अति उच्चा स्थान प्राप्त किया | सतगुरु रविदास ने निम्न वर्ग में जन्म लेकर प्रमाणित किया कि परमात्मा के सम्मुख कोई वर्ग या वर्ण भेद नहीं होता, छोटा-बड़ा नहीं होता उन्होंने शाश्वत हिंदू जीवन मूल्यों को जनता कि भाषा में उजागर कर पुनर्प्रतिष्ठा दिलाई | उनका जन्म १४३३ वि स में काशी के निकट मान्दुर ग्राम में पिता रग्घू और माता घुर्बिनिया के घर अछूत और उपेक्षित जाती में जन्म हुआ था | समाज में व्याप्त रूधियों, अन्धविश्वास सामजिक अन्याय और विषमता के विरुध्द समता और समभाव का जीवंत सन्देश दिया साथ ही इस्लामी कट्टरवाद का मुहतोड जवाब भी दिया --
  ||”चौदह सौ तैतीस कि, माघ सुधि पन्द्रास, दुखियों के कल्याण हित प्रगटे श्री रैदास”||               
  ||“पराधीन को दींन क्या पराधीन बेदीन, रविदास दास पराधीन को सब कोई समझे हीन”||  
  ||“पराधीनता पाप है जान लहू रे मीत, रविदास दास पराधीन सों कौन करे है प्रीत” ||
  ||“रामानंद मोहे गुरु मिल्यो पायो ब्रह्म विसास,राम नाम अमी रस पियो रैदास ही भयो पलास”||  
  ||“ऐसा चाहो राज मैं जहाँ मिले सबन को अन्न, छोटो बडो सम सम बसें रविदास रहे प्रसन्न”|| 
  ||”जात जात में जात है ज्यों केलन में पात रविदास न मानुष जुड सके जो लौंजात न जात”||
अपना धर्म परिवर्तन को कहने पर बादशाह सिकंदर लोदी स्पष्ट कह दिया कि --
  ||”वेद धर्म सबसे बड़ा अनुपम सच्चा ज्ञान फिर मैं क्यों छोडूँ इसे पढ़ लूँ झूठ कुरान,
  वेद धरम छोडूँ नहीं कोशिश करो हजार तिल तिल काटो देहि चाहे गोदो अंग कटार”|| -(रैदास रामायण)
||”प्रभु भक्ति श्रम साधना जग मह जिन्हहि पास, तिन्हहि जीवन सफल भयो सत् भाषे रविदास”||
||”अब मेरी बूडी रे भाई ताते चढ़ी लोक बड़ाई, अति अहंकार उर मा सत रज तम तामे रह्यो उरझाई”||    
 उन्होंने अपने सन्देश में कहा है कि हिंदू जीवन पद्यति जन्म और जाती नहीं कर्म प्रधान है --
||”जन्म जात को छोडकर करनी जान प्रधान इहो वेद को धरम है कहे रविदास बखान,
रविदास जनम के कारने होत न कोई नीच नर को नीच कर डारो है ओछे करम की कीच”||
वैदिक ऋषियों कि भांति उन्होंने वर्ण व्यवस्था कि भी पुनर्व्याख्या कि –
ब्राह्मण –||“काम क्रोध मद लोभ तजि करत धरम का कार, सोई ब्राहमण जनहि कहि रविदास विचार”||
क्षत्रिय – ||“दींन दुखी के हेत जो वारे अपने प्राण, रविदास उस नर सूर को सच्चा क्षत्री जान” ||
वैश्य-- ||”साँची हाटी पैठकर सौदा सांचा देय, तकरी तोले सांच की रविदास वैस है सोय”|| 
शुद्र-- ||”रविदास जो अति पवित्र है सोई सूदर जान, जड कुकर्मी असुध जन तिन्ही न सूदर जान”||
मन चंगा तो कटौती में गंगा” जैसी उनके जीवन कि कुछ अद्भुत और चमत्कारिक बातें  
१ अपने धर्म परिवर्तन को भेजे सदना कसाईं को ही प्रभावित कर रामदास हिंदू बना देना |
२ जल में ही शालिग्राम कि मूर्ति तैरा कर भक्तों को अभिभूत कर देना |
३ सिंहासन पर बैठी देव मूर्ति का रविदास के बुलाने पर रविदास के गोद में आ बैठना |
४ ब्राहमणों द्वारा साथ भोजन न करने पर प्रत्येक ब्राहमण को अपने दायें बाएं रविदास ही दिखाई देना |
५ माँ गंगा द्वारा रविदास कि भेंट स्वीकार कर बदले में हाथ बढ़ाकर दिव्य स्वर्ण कंगन देना |
६ स्वयं भगवान द्वारा साधू रूप में आकार पारस पथरी प्रदान करना पर रविदास ने प्रयोग न कर यूँ ही वापस कर दी |
रविदास जी अपने सम्पूर्ण जीवन काल में आत्मा कि अमरता, कर्म की शुचिता, पुनर्जन्म में आस्था, वेद, गीता, गंगा, गौ, राम, कृष्ण माने हिंदू धर्म की कसौटी से जरा भी नहीं डिगे | उन्हें धर्म प्ररिवर्तन के लिए जेल में भी डाला तथा भयंकर यातनाये भी दी गयी पर धर्म मार्ग से हटे नहीं | धर्म परिवर्तित न कर उन्होंने हिंदू धर्म पर बहूत बडा उपकार किया वरना आज इतना बडा हिंदू समाज नहीं बचता | उनकी महानता के चलते काशी नरेश,चित्तोड की महारानी झाली भक्तिन मीरा बाई जैसे उनके शिष्य बने चित्तोड में ही उनकी समाधी बनी |
            (ऐसे महान संत को उनके जन्म जयंती माघ पूर्णिमा १४ फरवरी को कोटि कोटि बधाई)   


No comments:

Post a Comment