“कुरुक्षेत्र --- (ब्रह्म सरोवर, सन्नहित सरोवर,
ज्योतिसर)”
कुरुक्षेत्र
महाभारत का पवित्र एवं प्रमुख स्थान है | महाभारत युद्ध में गीता का ज्ञान यहीं भगवान
श्री कृष्ण ने अर्जुन को दिया था | गीता का प्रथम श्लोक ‘धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे
------‘ से ही प्रारंभ होता है | महाकवि रामधारी सिंह दिनकर का महाकाव्य कुरुक्षेत्र
को हिंदी के १०० टॉप काव्यों में ७४ वां स्थान
प्राप्त है | यह तीर्थ ब्रहम सरोवर, सन्निहित सरोवर और ज्योतिसर को मिलकर बना है |
विषय
की बात करें तो ओरंगजेब ने अपने शासनकाल में अन्य हिन्दू तीर्थों की तरह कुरुक्षेत्र
में कर लगा दिया था जो ४ आना एक लोटा जल और एक रूपया स्नान पर था, और ये कर स्वतंत्र
भारत में कांग्रेसराज पर भी चलता रहा | १९६८ में गुलजारीलाल नंदा चुनाव लड़ने के लिए
कुरुक्षेत्र पधारे | वहां उन्हें तीर्थ की दुरावस्था के बारे में पता चला | नंदा जी
ने कुरुक्षेत्र के जीर्णोद्धार का बीड़ा उठाया | उन्होंने ‘कुरुक्षेत्र विकास बोर्ड’
की स्थापना की नंदा जी स्वयम उसके चेयरमैंन बने | तीनो सरोवरों (ब्रह्म सरोवर, सन्निहित
सरोवर और ज्योतिसर) का कायाकल्प हुआ | ओरंगजेब ने इस तीर्थस्थान का नाम भी परिवर्तित
कर मुगलपुरा कर दिया था, जो नंदा जी के प्रयासों से पुराना नाम बदलकर पुरुषोत्तम पूरा
कर दिया गया | साथ ही सभी कर भी हटा दिए गए | स्मरण रहे की गुलजारीलाल नंदा तीन बार
भारत के प्रधान मंत्री रहे |
कुरुक्षेत्र
पर लिखी गई दिनकर की काव्यपंक्ति हिंदी साहित्य की अनमोल कृति है जो अक्सर काव्य प्रेमी
गुनगुनाते है ----- क्षमा शोभती उस भुजंग को जिसके पास गरल हो,
उसको क्या जो दंतहीन, विषहीन,
विनीत सरल हो ||
छठी
शताब्दी के भारत के प्रसिद्ध न्यायप्रिय राजा हर्ष की राजधानी थानेश्वर ( स्थानेश्वर)
भी समीप है | सन्निहित सरोवर में पिंडदान का बड़ा महत्त्व है | कहते है की पौराणिक नदी
सरस्वती भी यहीं से प्रवाहित होती थी | ये
बड़ा ही पुनीत स्थल है इसकी ८४ कोस की पौराणिक सीमा है | यहाँ की धूल भी प्राणी को पाप
मुक्त करने की क्षमता रखती है | इसे बसाया भी महाराजा कुरु ने ही था इसी लिए इसका नाम
कुरुक्षेत्र पड़ा | पुन्य स्थल होने के कारण ही यहाँ महाभारत लड़ा गया | यहाँ मरने वाला
सीधा स्वर्ग जाता है | धन्य हैं गुलजारीलाल नंदा जिन्होंने इसका जीर्णोद्धार किया
| सोमनाथ कुरुक्षेत्र का तो जीर्णोद्धार हो गया अयोध्या काशी मथुरा की बारी है
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