Friday, 21 August 2015

ओंकारनाथ ठाकुर 
(
जिन्होंने ६ माह से नहीं सोये इटली के शासक मुसोलिनी को अपने संगीत के सम्मोहन से यूँ ही सुला दिया)
(1897–1967) भारत के प्रसिद्द शिक्षाशास्त्री, संगीतज्ञ एवं हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीतकार  थे । उनका  सम्बन्ध ग्वालियर घराने  से था । वे तत्कालीन संगीत परिदृष्य के सबसे आकर्षक व्यक्तित्व थे। पचास और साठ के दशक में पण्डितजी की महफ़िलों का जलवा पूरे देश के मंचों पर छाया रहा। पं॰ ओंकारनाथ ठाकुर की गायकी में रंजकता का समावेश तो था ही, वे शास्त्र के अलावा भी अपनी गायकी में ऐसे रंग उड़ेलते थे कि एक सामान्य श्रोता भी उनकी कलाकारी का मुरीद हो जाता। उनका गाया  वंदेमातरम या 'मैया मोरी मैं नहीं माखन खायो' सुनने पर एक रूहानी अनुभूति होती है।

पण्डित ओंकारनाथ ठाकुर का जितना प्रभावशाली व्यक्तित्व था उतना ही असरदार उनका संगीत भी था।  उन्होने एक बार सर जगदीशचन्द्र बसु की प्रयोगशाला में पेड़-पौधों पर संगीत के स्वरों के प्रभाव विषय पर  एक बार वे अभिनव और सफल प्रयोग किया था। इसके अलावा १९३३ इटली की यात्रा पर थे, उन्हें ज्ञात हुआ की वहाँ के शासक मुसोलिनी को पिछले छः मास से नींद नहीं आई है । वहां  के पंडितजी के आयोजको को भी पता चला की पंडितजी के संगीत में बहुत बड़ा जादू और सम्मोहन है | आयोजको ने पंडितजी से पूछा की “आप हमारे शासक मुसोलिनी को संगीत के जादू से सुला सकते है क्या, यहाँ के सभी प्रयास विफल हो चुके है |” पंडित जी ने हलके से मन से कहा की “देख लेंगे” | उपरी मन से आयोजको ने अगले दिन मुसोलिनी के समक्ष पंडितजी का कार्यक्रम रख दिया और देखने को इटली की जनता भी बड़ी संख्या में पहुची | पण्डितजी ने मुसोलिनी के समक्ष सहज भाव से प्रस्तुति शुरू की जनता भाव विभोर हो गई | कुछ देर में मुसोलिनी भी झूमने लगे, और उनके गायन से प्रभावित हो उसे तत्काल नींद आ गई । उनके संगीत में ऐसा जादू था कि आम से लेकर खास व्यक्ति भी सम्मोहित हुए बिना नहीं रह सकता था। इटली की जनता पंडित जी की कला का और भारत की प्रतिभा का लोहा मान गई |

Monday, 3 August 2015

                                     “कोहेनूर हीरा
भारत की विश्व विख्यात धरोहर कोहेनूर हीरा, जिसे अंग्रेज भारत से दूर लंदन ले गए थे, भले ही दुनिया का सबसे अनमोल हीरा क्यों ना हो लेकिन उसके साथ मौत के आलावा पूरी तरह तबाही और बर्बादी भी जुडी है | कोहेनूर – (कोह-ए-नूर), का अर्थ है रोशनी का पहाड़, लेकिन इस हीरे की रोशनी ने ना जाने कितने ही साम्राज्यों को तबाह कर दिया | आंध्र-प्रदेश के गुंटूर जिले में स्थित एक खदान से इस बेशकीमती हीरे का निकलना बताया जाता है । ऐतिहासिक दस्तावेजों में सबसे पहले इस हीरे का उल्लेख बाबर के द्वारा 'बाबरनामा' में मिलता है । ‘बाबरनामा’ के अनुसार यह हीरा कोहेनूर नाम से पहले सन 1294 में ग्वालियर के एक गुमनाम राजा के पास था लगभग 1306 ई. के बाद से ही इस हीरे को पहचान मिली । कोहेनूर हीरा हर अपने धारण कर्ता के लिए श्राप बना | केवल ईश्वर और महिलाएँ ही इसके श्राप से मुक्त रहीं इतिहास से जुड़े दस्तावेजों के अनुसार 1200-1300 ई. तक इस हीरे को गुलाम , खिलजी, व लोदी साम्राज्यों के पुरुष शासकों ने अपने पास रखा पर श्राप के कारण सारे साम्राज्य अल्प कालीन रहे । 1083 ई. से शासन कर रहा काकतीय वंश भी 1323 ई. कोहिनूर के आते ही अचानक बुरी तरह ढह गया । काकतीयों के पतन के पश्चात यह हीरा 1325 से 1351 ई. तक मोहम्मद बिन तुगलक के पास रहा और 16वीं शताब्दी के मध्य तक यह विभिन्न मुगल सल्तनत के पास रहा और सभी का कल्पनातीत अंत हुआ | शाहजहां ने इस कोहेनूर हीरे को अपने मयूर सिंहासन में जड़वाया लेकिन उनका आलीशान और बहुचर्चित शासन उनके बेटे औरंगजेब ने छीनकर शाहजहाँ को उसके ही महल में नजर बंद कर दिया | उनकी पसंदीदा पत्नी मुमताज का इंतकाल हो गया | 1605 में एक हीरों जवाहरातों का पारखी फ्रांसीसी यात्री जो भारत आया उसने कोहेनूर हीरे को दुनिया के सबसे बड़े और बेशकीमती हीरे का दर्जा दिया । 1739 में फारसी शासक नादिर शाह भारत आया और उसने मुगल सल्तनत को परास्त किया । 1747 में नादिर शाह का भी कत्ल हो गया और कोहेनूर उसके उत्तराधिकारियों के हाथ में आ गया लेकिन कोहेनूर के श्राप ने उन्हें भी नहीं छोड़ा । उनसे यह हीरा पंजाब के राजा रणजीत सिंह के पास गया और कुछ ही समय राज करने के बाद रणजीत सिंह की मृत्यु हो गई और उनके बाद उनके उत्तराधिकारी गद्दी हासिल करने में ना कामयाब रहे । अन्ततः ये हीरा ब्रिटिश शासन के अधिकार में चला गया और अब उनके खजाने में शामिल हो गया। भारत में अंग्रेजी शासन के दौरान इसे ब्रिटिश प्रधानमंत्री बेंजामिन डिजराएली ने महारानी विक्टोरिया को तब भेंट किया जब सन 1877 में उन्हें भारत की भी सम्राज्ञी घोषित किया ब्रिटिश राजघराने को इस हीरे के श्रापित होने की बात पता थी | इसीलिए 1936 में इस हीरे को किंग जॉर्ज षष्टम की पत्नी क्वीन एलिजाबेथ के क्राउन में जड़वा दिया गया जो तब से लेकर अब तक वहीँ है | कोहिनूर में कुछ बदलाव भी हुए | 1852 में जब ८००० पोंड खर्च कर तराशा गया तो यह 186.16 कैरेट / 186.06 कैरेट (37.2 ग्राम) से घट कर 105.602 कैरेट / 106.6 कैरेट (21.6 ग्राम) का हो गया, किन्तु इसकी आभा में कई गुणा बढ़ोत्तरी हुई। जिससे इस रत्न का भार 81 कैरट घट गया । हीरे को मुकुट में अन्य दो हजार हीरों सहित जड़ा गया । आजादी के फौरन बाद भारत ने कई बार कोहिनूर पर अपना मालिकाना हक जताया है | 150 हजार करोड़ रुपये मूल्य के हीरे की असली हकदार महाराजा दिलीप सिंह की बेटी कैथरीन की सन् 1942 मे मृत्यु हो गई | वैसे अनेक भारतीयों का ऐसा भी मानना है की श्री कृष्ण की श्यामान्तक मणि ये ही कोहेनूर हीरा है

 

Sunday, 24 May 2015

“अफजल खांन और शिवाजी”

                 
“अफजल खांन और शिवाजी”
शिवाजी और कुटिल अफजल खान का संघर्ष को सभी जानते है | पर अपने शिवाजी भी शत्रु की कुटिलता पहचानने में आगे थे | शिवाजी ने अफजल को बिना कोई मौका दिए अपना बचाव करते हुए उसे ही मौत के घाट उतार दिया था | पर कांग्रेसी सरकार ने शिवाजी को महत्त्व न देते हुए अफजल को पीर बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी | तथा शुरू में एक कब्र बनवादी और उसको भव्य रूप देने का भी पूरा प्रयत्न किया | पर अफजल की कब्र का एक और पहलू है, जो राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा है । स्थानीय सूत्रों के अनुसार मुम्बई के नामचीन गुंडों तथा तस्करों का यहां से सम्पर्क है । पाकिस्तान से भी यहां के सूत्र जुड़े हुए हैं । ट्रस्ट का एक ट्रष्टी गुलाम जैनुल आबेदीन पाकिस्तानी था | 1993 में मुम्बई में हुए भयंकर बम विस्फोट का परीक्षण इसी इलाके में किया गया था । यह घटना कभी महाराष्ट्र के जिले प्रताप गढ़ की थी पर आज प्रताप गढ़ और महाबलेश्वर सतारा जिले का हिस्सा है | १८८५ के गजट के अनुसार तब तक यहाँ कुछ नहीं था | १९२० में अफजल की कब्र (दरगाह) का हल्का सा उल्लेख एक पुस्तक में मिलता है |
   यह पृष्ठभूमि जानने के बावजूद राज्य की कांग्रेस सरकार ने ‘अफजल मेमोरियल सोसायटी’ को वह पूरी जमीन, जिस पर सोसायटी ने अवैध रूप से कब्जा कर रखा था,  दे दी | पर चूंकि यह जमीन केन्द्रीय वन तथा पर्यावरण मंत्रालय की है, इसलिए यह प्रस्ताव केन्द्र सरकार के पास भेजा गया । राजग सरकार के पहले कार्यकाल में मार्च, 2003 में लोकसभा में भाजपा सांसद किरीट सोमैया ने  इस तथ्य पर सवाल पूछा | तत्कालीन पर्यावरण राज्यमंत्री दिलीपसिंह जूदेव ने बताया कि राज्य सरकार के प्रस्ताव को केन्द्र सरकार खारिज नहीं कर सकती । इसके बाद महाराष्ट्र विधानमंडल में डा. अशोकराव मोडक, जो स्वयं इतिहासविद् हैं, ने यह प्रश्न खड़ा किया । सतारा के जिलाधिकारी ने रपट दी कि यह सोसायटी अवैध है  । राज्य सरकार के इस अड़ियल तथा लचर रवैये के विरोध में तब राज्य की सभी हिन्दुत्वनिष्ठ ताकतें एकजुट हुई थी
अंग्रेजों के शासनकाल में ये जो कुछ चल रहा था वह भारत के स्वतंत्र होते ही रुकना चाहिए था। पर ऐसा हुआ नहीं। पहले छोटी-सी जगह पर बना यह स्मारक धीरे-धीरे भव्य रूप ग्रहण करता गया। इस स्मारक का विरोध भी होता रहा। 1959 में मुम्बई के धर्मार्थ मामलों के आयुक्त (चैरिटी कमिश्नर) ने ‘अफजल मेमोरियल तुर्बत ट्रस्ट’ को खारिज कर दिया । पर आयुक्त के इस आदेश का पालन नहीं हुआ। 1962 में "अफजल मेमोरियल सोसायटी" की स्थापना हुई। इस सोसायटी को राज्य की कांग्रेस सरकार ने 13,000 वर्ग फुट जमीन दे दी । उस पर सोसायटी ने 119 कमरे बनवाये, अफजल तथा सैयद बंडा की भव्य कब्रों बनायी गईं । वहां बिजली-पानी की व्यवस्था की गयी। धीरे-धीरे इस सोसायटी ने आसपास की 10,000 वर्ग फुट जमीन भी हड़प कर २३००० वर्ग गज कर ली । एक जमाने में मुम्बई के माफिया सरगनाओं हाजी मस्तान, करीम लाला तथा युसूफ पटेल ने इस सोसायटी की बहुत मदद की थी । बताया जाता है कि इस स्थान पर ज्यादा से ज्यादा मुसलमान आएं, इसलिए आने वाले को बिरयानी परोसी जाती थी तथा बख्शीश के रूप में 50 रुपए दिए जाते थे । महाबलेश्वर में जो पयर्टक जाते थे, उन्हें वहां का इतिहास बताने वाले मुसलमान गाइड बताते थे कि अफजल खान एक महान सूफी संत था, वह सज्जन तथा शांतिप्रेमी था । बाद में अफजल की कब्रा  पर हर साल उर्स मनाया जाने लगा । जिस दिन अफजल का वध हुआ, उस दिन हर साल मार्गशीर्ष शुद्ध सप्तमी को इस कब्रा का मुजावर (पुजारी) "दगा, दगा शिवाजी ने दगा किया" इस तरह जोर-जोर से चिल्लाता और छाती पीटते हुए प्रतापगढ़ से भागता आता था और ऐसा दृश्य उपस्थित करता था जैसे शिवाजी नाम के एक "अपराधी" ने ‘अफजल खान’ नाम के एक "सूफी संत" की हत्या की थी । अभी तक यहाँ ४० पुलिसकर्मी रहते है सरकार अब तक इन पर १.५ करोड़ रुपये खर्च कर चुकी है | क्या कांग्रेस राष्ट्र को बताने का कष्ट करेगी की उसने क्षत्रपति शिवाजी के लिए क्या किया ||
(अफजल की पुरानी जर्जर कब्र और वर्तमान में कांग्रेस की मेहरबानी से बनी दरगाह) 


“कुरुक्षेत्र और ओरंगजेब ---- (ब्रह्म सरोवर, सन्नहित सरोवर, ज्योतिसर)”

       “कुरुक्षेत्र --- (ब्रह्म सरोवर, सन्नहित सरोवर, ज्योतिसर)”
कुरुक्षेत्र महाभारत का पवित्र एवं प्रमुख स्थान है | महाभारत युद्ध में गीता का ज्ञान यहीं भगवान श्री कृष्ण ने अर्जुन को दिया था | गीता का प्रथम श्लोक ‘धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे ------‘ से ही प्रारंभ होता है | महाकवि रामधारी सिंह दिनकर का महाकाव्य कुरुक्षेत्र को हिंदी के १०० टॉप काव्यों में ७४ वां  स्थान प्राप्त है | यह तीर्थ ब्रहम सरोवर, सन्निहित सरोवर और ज्योतिसर को मिलकर बना है |
विषय की बात करें तो ओरंगजेब ने अपने शासनकाल में अन्य हिन्दू तीर्थों की तरह कुरुक्षेत्र में कर लगा दिया था जो ४ आना एक लोटा जल और एक रूपया स्नान पर था, और ये कर स्वतंत्र भारत में कांग्रेसराज पर भी चलता रहा | १९६८ में गुलजारीलाल नंदा चुनाव लड़ने के लिए कुरुक्षेत्र पधारे | वहां उन्हें तीर्थ की दुरावस्था के बारे में पता चला | नंदा जी ने कुरुक्षेत्र के जीर्णोद्धार का बीड़ा उठाया | उन्होंने ‘कुरुक्षेत्र विकास बोर्ड’ की स्थापना की नंदा जी स्वयम उसके चेयरमैंन बने | तीनो सरोवरों (ब्रह्म सरोवर, सन्निहित सरोवर और ज्योतिसर) का कायाकल्प हुआ | ओरंगजेब ने इस तीर्थस्थान का नाम भी परिवर्तित कर मुगलपुरा कर दिया था, जो नंदा जी के प्रयासों से पुराना नाम बदलकर पुरुषोत्तम पूरा कर दिया गया | साथ ही सभी कर भी हटा दिए गए | स्मरण रहे की गुलजारीलाल नंदा तीन बार भारत के प्रधान मंत्री रहे |
कुरुक्षेत्र पर लिखी गई दिनकर की काव्यपंक्ति हिंदी साहित्य की अनमोल कृति है जो अक्सर काव्य प्रेमी गुनगुनाते है ----- क्षमा शोभती उस भुजंग को जिसके पास गरल हो,
                   उसको क्या जो दंतहीन, विषहीन, विनीत सरल हो ||
छठी शताब्दी के भारत के प्रसिद्ध न्यायप्रिय राजा हर्ष की राजधानी थानेश्वर ( स्थानेश्वर) भी समीप है | सन्निहित सरोवर में पिंडदान का बड़ा महत्त्व है | कहते है की पौराणिक नदी सरस्वती भी यहीं  से प्रवाहित होती थी | ये बड़ा ही पुनीत स्थल है इसकी ८४ कोस की पौराणिक सीमा है | यहाँ की धूल भी प्राणी को पाप मुक्त करने की क्षमता रखती है | इसे बसाया भी महाराजा कुरु ने ही था इसी लिए इसका नाम कुरुक्षेत्र पड़ा | पुन्य स्थल होने के कारण ही यहाँ महाभारत लड़ा गया | यहाँ मरने वाला सीधा स्वर्ग जाता है | धन्य हैं गुलजारीलाल नंदा जिन्होंने इसका जीर्णोद्धार किया | सोमनाथ कुरुक्षेत्र का तो जीर्णोद्धार हो गया अयोध्या काशी मथुरा की बारी है |         
                                                                                                                                               






                                      "जाट आरक्षण और भाजपा"
चुनावी लाभ लेने के लिए २०१४ के लोकसभा चुनाव से एकदम पहले कांग्रेस ने जाट आरक्षण का कार्ड चला था | जिसे माननीय सर्वोच्च न्यायलय ने ये कहते हुए कि जाति के आलावा शैक्षिक और आर्थिक आधार का भी ध्यान रखना चाहिए था मार्च १५ में अमान्य कर दिया | पहले से ही भाजपा से नाराज चल रहे जाटो को एक और भाजपा के विरुद्ध मुद्दा मिल गया | भाजपा ने आश्वासन दिया है साथ ही भाजपा के सांसदों मंत्रियों को जाटों को मनाने के लिए लगाया गया है | पर यहाँ ये विचार स्मरणीय है की भाजपा सुप्रीम कोर्ट के विरुद्ध कैसे जाएगी | भारत की राजनीति में एक शाहबानो प्रकरण हुआ था | जिसमे कांग्रेस ने संसद में सुप्रीम कोर्ट के निर्णय को पलट दिया | तब भाजपा ने इसे न्यायालय का अपमान कह कर कांग्रेस की  खिचाई की थी | और भाजपा आज भी उस मुद्दे को भूली नहीं है | अब भाजपा सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के विरुद्ध किस मुंह  से जाएगी |
          क्या था शाहबानो प्रकरण --- एक ६२ वर्षीय मुस्लिम महिला शाहबानो को उसके पति ने १९७८ में तलाक दे दिया था | शरियत में तलाक आम बात है | पर शाहबानो भरण पोषण के लिए अदालत चली गई, और ये मुक़दमा ७ साल तक चलकर नीचली अदालत से सुप्रीम कोर्ट तक पहुँच गया | १२५ की दंड प्रक्रिया संहिता में "हर किसी को गुजरा भत्ता पाने का अधिकार है" ऐसा कह सुप्रीम कोर्ट ने शाहबानो के पति को गुजरा भत्ता देने का आदेश दिया | कट्टर पंथी मुसलमानों ने इस निर्णय को शरियत के खिलाफ माना और विरोध किया | १९८६ में दो तिहाई बहुमत वाली राजीव गाँधी की सरकार थी आखिर उसे भी झुकना पड़ा और सुप्रीम कोर्ट के निर्णय को उलटते हुए "मुस्लिम महिला तलाक संरक्षण कानून १९८६" पास कर दिया | अब तलाक शुदा मुस्लिम महिला को गुजरा भत्ता नहीं  मिलेगा | तब से लेकर आज तक भाजपा इसे सुप्रीम कोर्ट का अपमान और कट्टर पंथियों के सामने कांग्रेस का झुकाना बताती है | अब ये ही काम भाजपा सुप्रीम कोर्ट के खिलाफ जा कर कैसे कर सकती है | वैसे भी जाट २ से २`५ प्रतिशत है और १२ से १५ प्रतिशत संसाधनों का लाभ ले रहे है | दूसरी बात ये भी है की ओबीसी के  २७ % में ३ जातियां जाट, गुर्जर और यादव ही हावी है | शेष ओबीसी जातियां घाटे में है ऐसा इन जातियों का आरोप है |
यहाँ एक बात और स्मरणीय है की राजनाथ सिंह ने अपने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्रित्व काल में ओबीसी के अंतिम पायदान की जातियों को लाभ देने के लिए ओबीसी के ३ टुकडे किये थे और आरक्षण को २७ से २८ % किया था  जिसमे ओबीसी की ८० जातियों का बंटवारा इस प्रकार किया था - (१) - पिछड़ा २ जातियां (५%), () - अति पिछड़ा ८ जातियां (९%) तथा (३) - अत्यंत पिछड़ा ७० जातियां १४% | राजनाथ सिंह ने अनुसूचित जातियों के अंतिम पायदान की जातियों को भी लाभ देने के लिए अ.जा. आरक्षण का भी विभाजन  किया था | जो इस प्रकार था अ.जा. की कुल जातियां ६८ | (१) - दलित ३ जातियां (१० %), () - अति दलित ६५ जातियां (११%) | ये एक सुन्दर व्यवस्था थी लेकिन चल नहीं पाई क्योंकि बाद की सरकार ने इस व्यवस्था को समाप्त कर दिया और राजनाथ सिंह का दोनों वर्गों के आरक्षण में अंतिम पायदान की जातियों को मिलने वाला लाभ नहीं मिल पाया साथ ही राजनाथ सिंह को भी राजनैतिक लाभ नहीं मिला |(जातियों के आंकड़े सन २००० के है ) |
पुन: जाट आरक्षण पर आते है | जाट सुप्रीम कोर्ट के निर्णय को भाजपा की लचर पैरवी मान रहे है | परन्तु सच्चाई ये है की ये आरक्षण सु. को. के दरवाजे से बहार आना ही नहीं था ये तभी से प्रबुद्ध लोग और प्रबुद्ध जाट भी कह कर चल रहे थे | हर बुद्धिजीवी व स्वयं सुप्रीम कोर्ट भी कह रहा है की आरक्षण जातिगत नहीं आर्थिक आधार पर होना चाहिए पर राजनैतिक दलों के लिए वोटो का लालच ऐसा नहीं होने देता | जाटों का भाजपा से नाराजगी के अन्य कारन भी है, एक लोकदल का सत्ता शून्य होना और दूसरा जाट भवन खाली कराना | इस नाराजगी को लेकर जाट मोदी को माफ़ करने के मूड में नहीं दिखते | अत: जाट कोई भी मौका हाथ से नहीं जाने देना चाहते | वैसे भी जाट आरक्षण  का लाभ किसी को नहीं मिला | भाजपा को इस समस्या का स्थाई, सर्वमान्य और सम्मानजनक हल खोजना होगा | साथ ही जाटों को सीमा से बाहर जाकर मनाना अन्य जातियों की नाराजगी का कारण न बन जाये भाजपा को इस बात को भी ध्यान में रख कर चलना होगा | मोर्य, शाक्य, कुशवाह आदि जातियां ने तो जाट आरक्षण का विरोध शुरू भी कर दिया है | ये गंभीर समस्या भाजपा के गले की हड्डी न बन जाये |||  



Sunday, 1 March 2015

                                “देशी राज विदेशी नीति”
          देश को स्वतंत्र हुए ६५ वर्ष बीत चुके है | लोकतंत्र योवन पर है परन्तु दुःख तब होता जब आम भारतीय अपने को आज भी कानून से कोसों दूर पाता है | अंग्रेजी राज की तरह आज भी कानून दबंगों ,बाहुबलियो ,समाज के ठेकेदारों व राजनेताओ के इशारे पर नृत्य करता है | कानून व्यवस्था आज भी १९४७ पूर्व की पद्यति पर चल रही है | पीड़ित आज भी न्याय के लिए दर—दर भटकता मिल जायेगा | कचहरी से एक भी व्यक्ति न्याय से संतुष्ट बाहर आता नहीं दिखता | जिस अपने संविधान की बात की जाती है उसमे आज भी अधिकांश कानून अंग्रेजो के बनाये हुए है | दरसल अंग्रेज ३४७५० कानूनों के बल पर देश पर शासन करते थे | भारतीय पुलिस अधिनियम १८६० का है | इससे पहले सेना का कानून था | राइट टू ओफेन्स –अगर पुलिस आपको लाठी से पीटती है | और आप पिटाई से बचने को लाठी पकड़ते है या अपना बचाव करते है | तो ये सरकारी काम में बाधा का अपराध है | (लाला लाजपत राय को सांडर्स ने सर में १४ लाठीयां मारी, कमर से ऊपर लाठी मारना वैसे भी अपराध है | इस मामले को लेकर  भगत सिंह अदालत गए पर सांडर्स का कुछ नहीं बिगड़ा), क्योंकि राइट टू ओफेन्स है पर स्वयं के बचाव का कानून राइट टू डिफैंस नहीं है |
       अंग्रेजी राज के कुछ प्रमुख पुराने कानून—सिंचाई कानून १९१०, भूमि अधिग्रहण कानून १८९४, समिति पंजीयन अधिनियम १८६०, भारतीय सबूत अधिनियम १८७२, अनुबंध अधिनियम १८७२, नेगोशिएबिल इंस्ट्रूमेंट एक्ट १८८१, चल-अचल संपत्ति हस्तांतरण अधिनियम १८८२, इज्मेंट एक्ट १८८२, जनरल क्लाज एक्ट १८८७, पंजाब भूमि राजस्व अधिनियम १८८७, पंजीयन अधिनियम १९०८, सिविल प्रोसीजर कोड १९०८, | तलाक कानून १८६९, किसानो के कर्ज का कानून १८८४, गंगा पुल चुंगी कानून १८६७, सरकारी इमारतों का कानून १८९९, पुलिस कानून १८६१, आधुनिक रेस्टोरेंट आज भी १८६७ के सराय एक्ट से संचालित होते है | विधवा विवाह एक्ट १८५६, नगरपालिका अधिनियम १९१६ | संविधान के बारे में डा. अम्बेडकर ने ३ सित. १९५३ को (लागु होने के महज ३२ महीने बाद ) लोकसभा में काटजू के प्रश्न के उत्तर में कहा था की "लोग कहते है की मैने संविधान बनाया ,हाँ मैंने बनाया पर मैं तो भाड़े का टट्टू था मुझसे जो लिखाया वो मैंने लिखा मेरा बस चले तो मै पहला व्यक्ति होऊ जो इस संविधान को आग लगा दू |"               
 संविधान के बारे में कुछ जानकारी---
संविधान सभा में पहले ३८९ सदस्य थे इसकी पहली बैठक ९ दिसंबर १९४६ को हुई ओर अस्थाई अध्यक्ष सच्चिदानंद सिन्हा को बनाया गया | ११ दिसंबर को हुई दूसरी बैठक में डा. राजेन्द्र प्रसाद को स्थाई अध्यक्ष चुना गया | डा. भीमराव अम्बेडकर प्रारूप समिति के अध्यक्ष बने | संविधान का प्रारूप पी एन राव ने तैयार किया | समिति के अन्य सदस्य थे (१) एन गोपालस्वामी अयंगर (२) ऐ के स्वामी अय्यर (३) मोहम्मद सादुल्ला (४) के ऍम मुंशी (५) वी एल मित्तर (६) डी पी खेतान | बाद में मित्तर ओर खेतान के स्थान पर एन माधवराव व टी टी कृष्णमाचारी को लिया गया | संविधान के बनाने में २ वर्ष ११ माह १८ दिन लगे | २६ नवंबर १९४९ को संविधान बना व २६ जनवरी १९५० को लागु हुआ |
जिस संविधान पर हम गर्व करते है वह सब चोरी या उधारी का है | देखे कंहा से क्या लिया ---
(१) मोलिक अधिकार, न्यायिक पुनर्लोकन, उपराष्ट्रपति पद, राष्ट्रपति पर महाभियोग—अमेरिका |
(२) नीति निदेशक तत्व, राज्यसभा राष्ट्रपति द्वारा १२ सीटों का मनोनयन----आयरलैंड |
(३) गणतंत्रात्मक शासन प्रणाली---फ़्रांस |(४) संघात्मक व्यवस्था (यूनियन सिस्टम)-—कनाडा |
(५) संविधान संशोधन प्रक्रिया---दक्षिण अफ्रीका | (६) मोलिक कर्तव्य---पूर्व सोवियत संघ |
(७) संसदीय शासन प्रणाली, नागरिकता, मंत्रिमंडल का लोकसभा के प्रति दायित्व---ब्रिटेन |
(८) आपातकाल---जर्मनी | (९) संविधान की प्रस्तावना, केन्द्र राज्य सम्बन्ध---अष्ट्रेलिया |
(10) भ्रष्टाचारी, अपराधी, अनपढ़ कानून बनाने वाले (संसद)---भारत |
इसे कहते है “कंही कि ईंट कंही का रोड़ा, भानुमती ने कुनबा जोड़ा” | कुछ प्रबुद्द्ध लोगों का ऐसा भी मानना है की संविधान के निर्माण में सिर्फ कलम ओर कागज ही हमारा है ओर बाकि सब विदेशी है | पर तब तो कागज ओर कलम भी विदेश से आता था | अब मोदी सरकार कालवाह्य हो चुके १७०० पुराने कानूनों की पहचान कर चुकी है ओर शीघ्र ही उन्हें हटाने की भी तैय्यारी चल रही है |
         

Sunday, 22 February 2015

                                                               “हिन्दू कौन ?”
हिन्दू कौन है ये बड़ा ज्वलंत प्रश्न है ? हिन्दू नाम शताब्दियों से सम्पूर्ण भारतीय समाज अपने लिए जातीय, संस्कृतिक, राष्ट्रिय, एवं धार्मिक समुदाय के संबोधन के रूप में प्रयोग करता आ रहा है | हिन्दू शब्द को लेकर एक प्रबल दुष्प्रचार है कि खैबर दर्रे और सिन्धु के उस पार से आने वाले आक्रान्ताओं ने हिन्दू नाम दिया | इसके पीछे का एक तर्क ये भी दिया गया  कि फारसी लोग स  को ह  प्रयोग करते है इसी कारण सिन्धु, सिन्धु पार का क्षेत्र और क्षेत्रवासी हिन्दू नाम से उच्चारे गये | यह बात हिन्दू समाज को तर्क सम्मत लगी अत: स्वीकार भी कर ली | परन्तु फारसी भाषा में हिन्दू का अर्थ निक्रस्ट शब्दों (गद्दार, मक्कार, चोर आदि) में किया गया है हिन्दू समाज ने ये बात भी बिना बुद्धि पर जोर लगाये स्वीकार करली | एक दुष्प्रचार ये भी चल रहा है की मुस्लिम आक्रमण से पहले हिन्दू प्रयोग नहीं होता था | मुस्लिम आक्रमणों  के बाद ही हिन्दू शब्द लोकप्रिय हुआ |
    अब थोडा इस बात का अध्ययन करे की उपरोक्त तर्कों  में कितनी शक्ति है | जहाँ तक फारसी भाषा की बात है तो भारत के बहार हिन्दू शब्द का प्रयोग फारसी आदि धर्म ग्रन्थ “जेंदा वेस्ता”  और “शातीर” में पाया गया जो आर्य व हिन्दू और हिन्दू भूमि के रूप में है | एक बात और वहां यह शब्द सम्मानित शब्दों में है | अरबी में भारत को अल हिन्द  कहते है बता दें की अरबी में आदरणीय शब्द के लिए अल  का प्रयोग करते है |
एक अरबी कवि “लबि”  ने लिखा है---“ओ धन्य हिन्दू भूमि तू निश्चय ही हमारे सम्मान के योग्य है,
                                                      जिसमे परमेश्वर ने सच्चा ज्ञान वेद प्रकाशित किया है”  || 
हिन्दू इस्लाम के प्रचार के बाद काफ़िर हुआ | फारस से ही अरब गया परन्तु हिन्दू शब्द घ्रणित अर्थों में नहीं था | वस्तु स्थिति ये है की हिन्दू शब्द भारतीय परंपरा और मिटटी का ही शब्द है | असल तो यह मूलत: संस्कृत शब्द के सिन्धु से बना है | और फारस के आलावा भी असमी और गुजराती में भी स  को ह  ही बोला जाता है | यथा सन्देश – हन्देश, संपादक – हम्पादक, असोम – अहोम आदि | ६०६ ई. में हर्षवर्धन के राज्याभिषेक के समय भारत, आर्यवर्त से हिंदुस्तान प्रचारित हुआ | दरअसल भारत में सिन्धु दो नदियां हैं और सिन्धु देश भी दो है एक पूर्व में (पूर्व की सिन्धु ब्रहमपुत्र है) दूसरी पश्चिम में | संस्कृत में सिन्धु देश के वासीयों के लिए सैन्धव शब्द का अनेक बार प्रयोग हुआ है | महाभारत में तो पूर्व के सिन्धु देश और वहां के निवासियों का सैन्धव के रूप में प्रयोग बहुतायत से हुआ है | यहाँ एक बात और ध्यातव्य है कि अंको (१ से १० तक ) की विश्व को अमूल्य देन हिन्दुओं की है और जब ज्ञान की ये धरोहर फारस होते हुए अरब देसों मे पहुंची तो वहां इन अंको को हिन्द से आने के कारण  'हिन्दसा' कहा गया और जब ये हिन्दसा वहां से आगे पश्चिम देशों में गए तो अरब देशों से आने के कारण इन्हें 'अरेबिक न्यूमरल' कहा गया |   
ये हिन्दू की पहचान है -“आ सिन्धु सिन्धु पर्यन्ता यस्य भारत भूमिका, पित्रभु: पुन्यभूश्चैव सवै हिन्दू रितिस्म्रत:” 
वीर सावरकर, स्वामी दयानंद, स्वामी विवेकानंद, स्वामी श्रधानंद, तुलसीदास,संत तुकाराम आदि राष्ट्र मनीषियों ने गर्व से हिन्दू शब्द का प्रयोग किया | हिन्दू शब्दों का अनेक बार प्रयोग महाकवि  चंदरबरदाई  ने प्रथ्वीराज रासो  में -- ( जब हिन्दुदल जोर हुए छुटी मीरधर भ्रम ) में किया है तब तो मुसलमान ने भारत भूमि पर कदम भी नहीं रखा था | इसी तरह –वृद्ध स्मृति, कलिका पुराण, बार्हस्पत्य पुराण, शारंगधर पध्यति, रामकोष, मेदिनीकोष, जैन आगम आदि अनेक आदि हिन्दू ग्रंथो मे हिन्दू शब्द सम्मान के प्रति प्रयोग हुआ है | ये सभी ग्रन्थ भारत में मुस्लिम आगमन से बहुत पहले के है | एक परिभाषा और हिन्दू शब्द की सगर्व दी जाती है  -- हीनं दुषयति इति हिन्दू जाति विशेष: --शब्दकल्पद्रुम: | इनके बाद भी महाराणा प्रताप, गुरुतेगबहादुर, संत कबीर, पाल कवि, कवि भूषण, कवि सुजान, महाकवि वेन  आदि ने भी हिन्दू शब्द का सगर्व प्रयोग किया |  अत: हिन्दू शब्द पूर्णत: भारत की मिटटी का बना और सम्मानित ही नहीं गौरवान्वित करने वाला है | अब तो अंत में यही कहना पड़ेगा कि --
                                                                  "कहो गर्व से हम हिन्दू है हिंदुस्तान हमारा है"