Thursday, 22 March 2012

“भगत सिंह को फांसी नहीं गोली मारी गई थी”

                                       (हुसैनीवाला स्थित भगत सिंह ,सुखदेव व राजगुरु की समाधी का चित्र )
      भगत सिंह वो नाम है जो आज भी युवाओं के ह्रदय मे चिंगारी बनकर सुलगता है |२३ मार्च को उन्हें फांसी दी गई ऐसा सभी मानते है | पर उन्हें गोली मारी गई थी |-३ फर.१९२८ को लाहोर मे साइमन कमीशन का शांति पूर्ण विरोध कर रही जनता को एक युवा देख रहा था |नेतृत्व कर रहे लाला लाजपत राय और जनता पर अंग्रेजो ने लाठी चार्ज कर दिया |१४ लाठिया लाला जी के सर मे मारी गई |१७ नव .को उनकी मोत हो गई |ये क्रूर दमन युवा भगत सिंह से देखा नहीं गया | और मित्रों के साथ मिलकर बदला लेने की ठान ली | तथा ठीक एक माह बाद यानि १७ दिस .को लाला जी के हत्यारे अंग्रेज अफसर सांडर्स की हत्या कर लालाजी की मोत का बदला ले लिया | ८ अप्रेल १९२९ को अंग्रेजों के क्रूर दमन की आवाज विश्व मे पहुचने के लिये असेम्बली मे बम फेंका , भाग सकते थे लेकिन भागने के बजाय गिरफ्तार होना श्रेयष्कर समझा | इससे अंग्रेज सरकार तिलमिला उठी , जिनके राज मे कभी  सूरज नहीं छिपता था उनको चुनोती मिलनी शुरू हो गई थी | भगत सिंह को १७ अक्तू .१९२९ को मृत्युदंड सुनाया गया और २४ मार्च १९२९कि तारीख तय हुई | ये आम धारना है की भगत सिंह को सुखदेव व राजगुरु के साथ फांसी दी गई | पर हकीकत कुछ और है |    ३१ मार्च १९३१ को लाहोर मे कांग्रेस अधिवेशन होने वाला था | अतः २३ मार्च को अंग्रेज शासको और कांग्रेस के द्वारा मिलकर एक नाटक रचा गया | नाम रखा गया “ऑपरेशन ट्रोजन होर्स” इसमे कई अंग्रेज अफसर गुप्त रूप से लगे थे | पंजाब गवर्नर का पी.ए. और डी.एस.पी. सांडर्स का ससुर जैंसी भगत सिंह से बहुत घृणा करता था, ओर बदला लेने को बेताब रहता था | कांग्रेस को चिंता थी की अधिवेशन को कोई आंच ना आये , इसलिए २२ व २३ मार्च की रात मे ही (फांसी के निश्चित समय २३ मार्च प्रात: से पूर्व ) षड्यंत्रकारियो ने तीनों क्रांतिकारियों को फांसी पर चढाकर मारने से पहले नीचे उतार लिया था और जल्लाद को गोली मार दी ताकि भेद ना खुले | इसके बाद जैंसी ने अपनी बेटी के पति की हत्या का बदला लेने के लिये तीनों क्रांतिकारियों को गोली मार दी | फिर चारो ( भगत सिंह ,सुखदेव ,राजगुरु व चोथा जल्लाद ) शवो के टुकड़े-टुकड़े कर बोरियों मे भर कर , जेल के पीछे से दीवार काट कर , उन्हें ट्रक मे भर कर ,एक शव (जल्लाद) को ६ मील दूर व्यास नदी के किनारे जला दिया | शेष तीनों को सतलुज के किनारे हुसैनीवाला मे  मिटटी का तेल डाल कर जला दिया गया |  और कई तथ्य भी इस बात को पुख्ता करते है | (१) फांसी एक दिन पूर्व क्यों दी गई , प्रातः ८ बजे लगने वाली फांसी रात्रि मे क्यों दी गई ? (२) नियमानुसार शव परिजनों को क्यों नहीं सोंपे गए ? (३) चार शव किसके थे और दो स्थानों पर आनन् फानन मे क्यों जलाये गए ? (४) १९३१ मे लाहोर जेल मे कार्यरत सी.आई.डी.कर्मचारी दाताराम ने दूरदर्शन पर १९८१ के एक साक्षात्कार मे कहा था की “फांसी का तो बस नाटक किया गया था” | (५) एक और व्यक्ति दलीप सिंह इलाहबादी जो ब्रिटिश इंटेलिजेंस ब्यूरो मे एजेंट था , ने अपनी म्रत्यु से पूर्व १९८६ मे भगत सिंह की हत्या के इस षड्यंत्र का खुलासा किया था | इस एजेंट ने कांग्रेस पर नजर रखने के लिये आनंद भवन मे माली की नोकरी भी की थी , और साइमन कमीशन के विरोध प्रदर्शन के दोरान नेहरू को चांटा भी मारा था | उपरोक्त सारे तथ्यो तथा अन्य बातो पर एस .सिन्हा ने अपनी पुस्तक “सम हिडेन फैक्ट : मारटेडीयम ऑफ शहीद भगत सिंह” मे विस्तार से प्रकाश डाला है|                                                            “तुझे जिबह करने की खुशी और मुझे मरने का शोक, मेरी भी मर्जी वही जो मेरे सय्याद की है"  
                                                                                                                                                भगत  सिंह आज २३ मार्च को इन हुतात्माओ को कोटि -कोटि नमन |

No comments:

Post a Comment