Tuesday, 27 March 2012

          नववर्ष १ जनवरी कितना पुराणिक कितना वैज्ञानिक”          
रोमन साम्राज्य में जूलियस सीजर ने ईसा पूर्ब ९६ में प्रचलित कैलेंडरो का एकीकरण एवं संशो -धन कर जूलियस कैलेंडर बनाया था | उस समय तक कैलेंडर में १० मास होते थे तथा हिन्दू नवबर्ष (चैत्र शुक्ल प्रतिपदा) के साथ २५ मार्च से नया वर्ष प्रारम्भ होता था | मार्च (पहला) , अप्रैल (दूसरा) , मई (तीसरा) , जून (चोथा) , जोलाई (पांचवा) , अगस्त (छटा) , सितम्बर (सातवा) , अक्टूबर (आठवां) , नवम्बर (नवां) , दिसम्बर (दसवां) , पूर्णतया भारतीय पद्धति पर आधारित थे | बाद में जूलियस सीजर के नाम पर जनवरी और फैब्रुअस देवी के नाम पर फरवरी जोड़कर १२ मास किये गये | दरसल एक सौर वर्ष का वास्तविक मान ३६५.२४२२ दिन होता है | लेकिन जूलियस कैलेंडर में इसे ३६५.२५ मानकर चलते है | अत .००७८ दिन का समय बचता चला जाता है | जिसे चोथे वर्ष फरवरी को २९ दिन की बनाकर ३६६ दिन का साल कर दिया जाता है | परन्तु फिर भी समय बच जाता है , तो हर ४०० वां वर्ष पुनः ३६६ दिन का मनाया जाता है | इस कैलेण्डर में दिन भी रवि, सोम , मंगल , आदि संडे , मंडे , थर्सडे भारतीय पद्धति पर रखे गये | सीजर ने ही कहा की ४४५ ई० सन १/४ दिन का होगा | इतिहास में सम्भ्रम वर्ष ( कन्फ्यूजन वर्ष )  के रूप में जाना जाता है | यह कैलेंडर १५८२ ई० तक चला |
         १५८२ में ईस्टर पर १० दिन का अंतर आ गया | अत: १५८२ में तेरहवें पोप ग्रेगरी ने जूलियस कैलेंडर में पुनः संशोधन किया | उन्होंने आदेश दिया कि ५ अक्टूबर शुक्रवार को १० अक्टूबर शुक्रवार माना जाये | यह ग्रेगेरियन पंचाग के नाम से जाना गया | इसमें भी ३३०० वर्ष बाद यानि ५३१२ ई. में पुनः १ दिन का अंतर आ जायेगा तब फिर १ अक्टूबर को २ अक्टूबर माना जायेगा |
         ग्रेट ब्रिटेन में तो ग्रेगेरियन कैलेंडर १७५२ में मान्य हुआ | तब वहाँ २ सितम्बर बुधवार को १४ सितम्बर गुरुवार माना गया | क्योंकि वहाँ ११ दिन का अंतर चल रहा था | १७५२ में ही २५ मार्च के स्थान पर १ जनवरी से नये साल कि शुरुआत हुई | कुछ पश्चमी देशो ने तो बीसबीं शताब्दी के अंत में जाकर यह ग्रेगेरियन कैलेंडर स्वीकार किया ये है उलझाऊ , अटपटी ,अवैज्ञानिक १ जनवरी कि कहानी जिसका हम पागल होकर अन्धानुकरण कर रहे है | जिसे पश्चिम वालो ने ही कल परसों स्वीकार किया | इसका किसी के राज्याभिषेक , जन्म –मरण , हर्ष , विजय , प्रकृति , मोसम , पर्यावरण , भोगोलिक स्थिति से कोई लेना देना नहीं है |

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