“काली नदी-प्रागैतिहासिक
भागीरथी”
सभी प्राचीन सभ्यताए नदियों के ही
किनारे पुष्पित पल्लवित हुई है | इसका प्रमुख कारण है की उस समय जल मार्ग ही
आवागमन के प्रमुख साधन हुआ करते थे | सरस्वती, सिन्धु, नील
नदी
की सभ्यताए इसका उदहारण है | लन्दन टेम्स और मास्को मस्कवा नदी के तट पर बसे है | मोहन्जोंदाडो,लोथल, हड़प्पा सभ्यता सरस्वती नदी
के किनारे विकसित हुईं ओर नदी के साथ ही समाप्त हो गयी | त्रेता युग में मेरठ को
मय दानव द्वारा मयराष्ट्र के रूप में हेमा के कारण इंद्र से छुपकर मायावी नगरी के
रूप में बसाया गया था | जो उस समय की पूर्ण विस्तृत काली नदी के पश्चिम मुहाने पर
बसा था | तब ये नगर से सट कर बहती थी यहाँ अब वर्तमान में कचहरी है | काली नदी की
बार बार की बाढ़ की तबाही से बचने के लिए अंग्रेजो ने इसे खुदवाकर नगर से १० किलोमीटर दूर पूरब में वर्तमान स्थान पर
पहुचाया था | अब भी यदि कभी बाढ़ की स्थिति आती है जैसा की १९६२ व १९७८ में देखने
को मिली, तो ये नदी अपने पूर्व मूल मार्ग पर ही नगर से सटकर बहने लगती है और १ से
दो किमी का विस्तार कर लेती है | जो उपरोक्त बात की पुष्टि करता है | मेरठ के
उत्तर में व रुड़की रोड के १-१.५ किमी पूरब में सोफिपुर, गुरुकुल डोरली, पल्हैडा के पूरब के
जंगल को आज भी ग्रामवासी नदी कहकर पुकारते हैं | इस क्षेत्र में आज भी ६ से १० फूट
नीचे बालुका पट्टी मिलती है | गत दिनों कचहरी परिसर में भी “तेरह न्यायालय कोर्ट”
के निर्माण के समय भी १० फिट मोटी बालुका पट्टी मिली थी | लावड मार्ग पर काली नदी
के पुल के ऊपर खड़े होकर मेरठ की और देखने से साफ़ दिखता है की नदी को पूरब की और
खोदकर मोड़ा गया है | इसी क्षेत्र के गांव खानोदा के एक बुजुर्ग शाहबुद्दीन का कहना
है की “हमारे दादा परदादा ने काली नदी की खुदाई में दो पैसा रोज पर मजदूरी की थी
|”
काली नदी की प्राचीनता का प्रमाण
हमें ‘बाल्मीकि रामायण’ के अयोध्या कांड के सर्ग ७१ में भी देखने को मिलाता है |
जिसके अनुसार महाराजा दसरथ के मरणोपरांत जब भरत अपने ननिहाल कैकेय देश की राजधानी
गिरिव्रज से अयोध्या लौट रहे थे तो मार्ग में पड़ने वाले नदी और प्रदेशो का जिक्र
रामायण में आया है | इस यात्रा में यमुना
के पूरब में भागीरथी और फिर गंगा का जिक्र है, यानि यमुना –गंगा के बीच एक विशाल
भागीरथी नदी (काली नदी) थी –
“यमुना प्राप्य संतिर्नोबलम माश्वास यत्तदा, भागीरथीम दुश्प्रतराम सोशुधाने
महानदीम | ७१\६
उपायाद्राघव स्तुर्नम प्राग्वटे विश्रुते
पुरे, स गंगा प्राग्वटे तीर्त्वा समायात कुटि कोष्ठिकाम | ७१\९
(यमुना पार करके सेना को विश्राम दिलाया, फिर
दुश्प्रतरा (कठिनाई से पार करने योग्य) भागीरथी महानदी को पार करके प्राग्वट में
गंगा नदी को पार किया) | उत्तरीय मत्स्य देश को पार करके भरत यमुना किनारे पहुंचे
थे |
प्राग्वट की स्थिति फतेहगढ़ के समीप बताई जाती है | इस प्रकार रामायण कालीन
भागीरथी ही वर्तमान काली नदी है | मानचित्र में भागीरथी गंगोत्री से निकलकर कुछ
दूर पश्चिम को चलकर दक्षिण को बहती है | टिहरी जनपद में अपना प्रवाह पूर्व को लेकर
रूद्र प्रयाग में अलकनंदा से संगम करती हुई तथा मार्ग में पड़ने वाली पहाड़ी नदियों
को अपने में आत्मसात करती हुई गंगा का रूप लेती है | मानचित्र पर ध्यान देने से
प्रतीत होता है की भागीराथी का सीधा प्रवाह दक्षिण भारत की और था | किसी भोगोलिक
विक्षोभ के कारन यह पूर्व को मुड कर अलकनंदा में जा मिली | और बीच में ये प्रवाह लुप्त
होकर मुजफ्फरनगर जिले की जानसठ तहसील के गाँव अन्तवाडा में यह श्रोत पुन: फूट पड़ा,
और आगे बढ़ता हुआ मेरठ, बुलंदशहर में बड़ी काली नदी का रूप ले ले लिया | मेरठ नगर के पास काली नदी का
प्रवाह गुरुकुल डोरली के पास से होता हुआ, कचहरी और फिर पुरानी तहसील के पूर्व की
और से था | १९६७ में पल्हैडा के जंगल में एक ट्युबैल के बोरिंग के समय ८०-१०० फूट
नीचे नाव की लकड़ी के टूकडे,जो कोयले का रूप धारण कर रहे थे, मिले थे | लकड़ी को इस
स्थिति में आने में लाखों साल लगते है |
(स्वतंत्रता सेनानी रत्नाकर शास्त्री
का काली नदी पर शोध परक लेख, ये मेरठ के पल्हैडा निवासी और रामायण
के विद्वान् थे)

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