Friday, 6 May 2016

“एकलव्य का अंगूठा और दलित चिन्तक”

                 
                  “एकलव्य का अंगूठा  और दलित चिन्तक”         

               भारत में अपने शासन को स्थायित्व और प्रमाणिकता प्रदान करने के लिए अंग्रेजों ने शक्ति के साथ बुद्धि का भी भरपूर प्रयोग किया | इसी अवधारणा को बल प्रदान करने के लिए उन्होंने आर्यों का भारत में बहार से आना बताया | और धीरे धीरे समाज में, शिक्षा में, संस्कृति में, पुरातन सांस्क्रतिक वांग्मय में अपने स्वार्थ को सिद्ध और स्थापित करने वाली बाते स्थापित करनी शुरू कर दी | क्योकि भारतीय जनमानस सहज स्वीकार कर ले तो हमारे पुरातन ग्रंथो को तोड़ मरोड़ कर नई नई बाते उनमे डालनी शुरू कर दी | इससे उन्हें हिन्दू समाज में भेद पैदा करने का अवसर भी मिल गया | और हिन्दू समाज में ही उन्होंने अपने अनुगामी भी पैदा कर लिए | क्योकि अंग्रेजी कालखंड आते - आते संस्कृत के जानकर उँगलियों पर ही रह गए थे अत: संस्कृत ग्रंथो का अपने अनुसार अनुवाद कराने में उन्हें कोई परेशानी नहीं हुई | दलितों के बारे में वैसे तो उस समय व्यवहार में काफी विसंगतिय फैली थी सवर्ण - अवर्ण में गतिरोध था | ये विसंगति परिस्थिति के कारण थी पर अंग्रेजो ने इसे शास्त्र सम्मत सिद्ध करने का भरपूर प्रयास किया और उसका लाभ उठाया | उन बातो में दलित चिन्तक भी उलझ गए और आज दलित राजनीति करने वाले भी उसी राह पर चल पड़े है | इसी के चलते ये लोग सवर्णवाद, ब्राह्मणवाद और मनुस्मृति को जीभरकर कोसते है | वैसे इतिहास में उन्हें बहुत ज्यादा कुछ तो नहीं मिलता पर “राम का शुद्र शम्बूक को मारना”, रामायण की “ढोल गंवार शुद्र पशु नारी” वाली चोपाई और गुरु द्रोणाचार्य द्वारा “एकलव्य का अंगुठा गुरु दक्षिणा में मांगना” आदि |
       अभी हम यहाँ केवल एकलव्य की ही चर्चा करेंगे | एकलव्य के विषय में इन लोगों का कहना है की एक स्वर्ण ब्राह्मण गुरु द्रोणाचार्य ने एक शुद्र बालक एकलव्य का अंगूठा इस लिए गुरु दक्षिणा में मांग लिया की पांडवो यानि राजपुत्रो का कोई प्रतिस्पर्धी न रहे | और एक शूद्र अच्छा तीरंदाज न बन सका | या बनने से रोक दिया | इस प्रश्न का उत्तर यदि थोड़ी सी भी मेहनत करे तो हमें महाभारत में ही मिल जायेगा है | देखें एक बार परशुराम जेष्ठ की दोपहरी में कर्ण की जंघा पर सर रखकर सो रहे रहे थे कि कर्ण को बिच्छु जहरीला कीड़ा काट लेता है | काफी खून निकलता है पर कर्ण इस असहनीय दर्द को सहज भाव से अविचिलित होकर सह जाते है | अचानक रक्त की गर्मी महसूस कर परशुराम की आँख खुल जाती है तो देखते है कर्ण सहज भाव से दर्द सह रहा है और उफ़ तक नहीं की | तब उन्हें कर्ण पर शक होता है और पूछते है की कर्ण तूने ब्राह्मण युवक के नाते मुझसे शिक्षा ग्रहण की है | पर तू ब्राहमण नहीं है इतना कष्ट ब्राह्मण बालक नहीं क्षत्रिय बालक ही सह सकता है बता तू कौन है ? पर कर्ण को तो अपना पता ही नहीं था तो बताता क्या ? तब परशुराम कहते है कि तू निश्चित ही क्षत्रिय है | और तब परशुराम कर्ण को निर्विकार भाव से श्राप देते है की “छल – कपट और धोखे से प्राप्त की गई शिक्षा फलदाई नहीं होती कर्ण | और तूने भी छल से शिक्षा ग्रहण की है जा कर्ण जब तुझे इस शिक्षा की सबसे ज्यादा आवश्यकता होगी तब ये तेरा साथ नहीं देगी |” और एक दिन कुरुक्षेत्र में लड़ते हुए रेत में रथ का पहिया धसने के कारण इसी श्राप के चलते कर्ण मारा जाता है |’ एक ब्राहमण एक क्षत्रिय की मौत का कारण बनता है इस बात की कोई चर्चा भी नहीं करता | एकलव्य ने भी छल और धोखे से शिक्षा ग्रहण की थी || दूसरी बात एकलव्य सव्यसाची था याने दोनों हाथो से तीर चलाने में माहिर | और तीर संधान में सीधे हाथ के अंगूठे का इतना महत्त्व होता ही नहीं जितना की तर्जनी और माध्यमा अँगुलियों का | जो घ्रणा आज के दलित चिंतकों के मन में है वह एकलव्य के मन में भी होनी चाहिए थी पर लेशमात्र भी एकलव्य के मन में नहीं थी | क्योंकि युधिष्ठिर के राजसूय यज्ञ में एकलव्य अतिथि गणों के मध्य विराजमान था | एक बात और एकलव्य जरासंध के सेनापति का पुत्र था | ये बाते उसे सहानुभूति का पात्र नहीं बनाती है |
  महाभारत का ही एक अन्य प्रसंग भी इसी सन्दर्भ में विचारणीय है | कृष्ण और बर्बरीक का | ‘महाभारत युद्ध की घोषणा हो जाती है | योद्धा अपनी अपनी दिशा तय कर कुरुक्षेत्र की ओर बढ़ते हैं | वीर बालक बर्बरीक भी माँ से स्वीकृति ले कि “हारने वाले की ओर से ही युद्ध करूँगा” कुरुक्षेत्र के लिए चल पड़ता  है | कृष्ण को पता चलता है की ये तो अजेय है युद्ध की बाजी पलट देगा | अत: परीक्षा लेते है | कृष्ण ब्राह्मण का वेश धारण कर बर्बरीक को रास्ते में रोक कर पीपल के पेड़ के सारे पत्ते बींधने की परीक्षा लेते है | एक पत्ता कृष्ण ने पैर से छुपा रखा था तीर सारे पत्ते बींधकर अंततः पैर के चक्कर लगाने लगा | बर्बरीक ने कहा महाराज पैर हटा लो वरना ये तुम्हारे पैर को क्षति पहुँचा देगा | बर्बरीक के पास केवल तीन ही बाण थे पर ये त्रिलोक विजय के लिए काफी थे | कृष्ण ये बात जानते थे | अत: इस ब्राह्मण ने बालक बर्बरीक से दान की इच्छा व्यक्त की | बालक ने सहर्ष स्वीकार कर लिया | कृष्ण ने तुरंत दान में बर्बरीक का शीश मांग लिया | बालक हतप्रभ रह गया | पर वचन की तो हाँ कर चुका था | बर्बरीक समझ गया की तेरा सामना किसी आम मनुष्य से नहीं हुआ है | अत: उसने ब्राह्मण से वास्तविक स्वरूप में आने को कहा | कृष्ण वास्तविक स्वरूप में आये और बताया की बड़ा युद्ध होने जा रहा है अत: किसी बड़े वीर की बलि युद्ध भूमि को चाहिए थी भला आपसे उपयुक्त और कौन हो सकता है इस काम के लिए | तब बर्बरीक की इच्छानुसार कृष्ण ने उसे अपने विराट स्वरूप के दर्शन भी कराये और वरदान भी दिया की ‘तू कलियुग में मेरे नाम से पूजा जायेगा’ | तब बर्बरीक ने अपनी इच्छा भी बताई कि मैं तो युद्ध देखने के लिए आया था | कृष्ण ने कहा तेरी ये इच्छा मै पूरी करूँगा और उसका सर एक ऊँचे टीले पर स्थापित कर दिया जाता है | यहाँ एक ब्राह्मण एक क्षत्रीय बालक का सर यूँ ही बातों - बातों में ले लेता है | पर कभी किसी को चर्चा करते सुना क्या ? बर्बरीक के मन में भी कोई विद्वेष कृष्ण के प्रति नहीं था | इसका उदहारण भी महाभारत में ही है | युद्ध के अंत में विजय का श्रेय लेने को पांडवो में अहंकार आ जाता है की युद्ध मेरे कारण जीता गया | तब कृष्ण ही समाधान निकलते है की एक व्यक्ति है बर्बरीक का शीश जिसने सारा युद्ध देखा है सही निर्णय वो ही कर सकता है | सब लोग बर्बरीक के शीश के पास जाते है | शीश बताता है की ‘मुझे तो पूरे युद्ध में कृष्ण का सुदर्शन चक्र की घुमाता, रक्त बहता, सर धड से अलग करता नजर आ रहा था | युद्ध का असली विजेता तो कृष्ण ही है |’ यदि बर्बरीक के मन में जरा भी कृष्ण के प्रति विद्वेष होता तो वो विजेता अपनी सर कलम करने वाले को ही बताता क्या ?

      गुरु द्रोणाचार्य ने एकलव्य तथा कर्ण को भी शिक्षा देने से मना कर दिया था क्योकि कर्ण एक सारथि अधिरथ का पुत्र था | द्रोणाचार्य ने कहा था कि मै राजकुमारों को ही शिक्षा देता हूँ | एक और बात गुरु द्रोणाचार्य कुलगुरु थे | वे क्यों चाहेंगे की राजपरिवार का कोई प्रतिस्पर्धी हो ? वे तो चाहेंगे की उनका शिष्य ही विश्व का सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर हो | ओर उसके लिए वो निरंतर प्रयासरत भी रहे | इन्होने इसीलिए एकलव्य और कर्ण को शिक्षा देने से मना भी कर दिया, क्योंकि फिर दोनों के साथ न्याय नहीं कर पाते | एक बात और यदि आज हम निष्पक्षता से विचार करें तो देखेगें की सारा ज्ञान ब्राह्मणों के पास था | देवताओं के बाद परशुराम, विश्वामित्र, वशिष्ठ आदि के पास सर्वोच्च शास्त्र और शस्त्र ज्ञान था | पर ये लोग कभी चक्रवर्ती सम्राट नहीं बने बल्कि राजकुमारों को ही बनाया | चाणक्य एक बालक को मिट्टी से उठाकर चक्रवर्ती सम्राट चन्द्रगुप्त मोर्य बना देते हैं | दूसरी बात शस्त्र ज्ञान हमेशा राजकुलों के अधीन ही तो रहे और रहने चाहिए भी | क्या आज भी कोई रिवोल्वर या कोई अन्य हथियार लेकर चल सकता है | सरकारें लाइसेंस देती है | तब जाकर कोई शस्त्रधारी बनता है | कोई बड़े हथियार के बारे में तो सोंच भी नहीं सकता | आज भी ‘इसरो’ या ‘डीआरडीओ’ का कोई कर्मचारी अपने संसथान की जानकारी बाहर दे सकता है | या कोई प्रशिक्षण दे सकता है’ नहीं | फिर एकलव्य क्यों पारंगत हो | आगे चलकर हस्तिनापुर साम्राज्य के लिए कांटा बने | ऐसा गुरु द्रोणाचार्य क्यों चाहते ? जरा सोचें मे और आप भी नहीं कर पाते | कोई भी आएगा और शस्त्र सञ्चालन में निपुण हो जायेगा | यहाँ एकलव्य या कर्ण का प्रश्न नहीं है ये तो सीधे साम्राज्य के निष्कंटक और सर्वोच्चता का है | कोई कुछ भी सोचे वो अलग बात है | 

Friday, 15 April 2016

 अम्बेडकर का सच । जिसे आप सभी को जानना जरूरी है:--

निसंदेह दलितों पर सवर्ण हिन्दुओं के असहनीय अत्याचारों का दूसरा नाम ही डा. अम्बेडकर है | पर आज जो नाम, पहचान, सम्मान, बाबा साहेब का है वो भी सवर्णों के कारण ही है | ये नहीं भुलना चाहिए इन सवर्णों के बिना बाबा साहेब कहीं अँधेरे में खो गए होते | दलित नेता जब बाबा साहब डा. अम्बेडकर पर भाषण देते हैं तब बड़ी धूर्तता से उन व्यक्तियों का नाम ही नही लेते जिसने उन्हें "बाबा साहब भीमराव रामजी अम्बेडकर" बनाया । बड़ोदरा रियासत के महाराजा सयाजी गायकवाड को एक चिठ्ठी मिलती है । जिसमे एक युवक ने लिखा था की वो दलित है पढाई करने के लिए ब्रिटेन और अमेरिका जाना चाहता है, लेकिन धनाभाव के चलते संभव नही हैं और कोई भी उसकी मदद नही कर रहा है । चिठ्ठी के साथ अंक तालिकाएं (Mark Sheets) भी संलग्न (Attach) थी । चिठ्ठी पढ़ते ही महाराजा सयाजी गायकवाड़ ने उन्हें मिलने के लिए बुलाया और उन्हें ब्रिटेन और अमेरिका पढने के लिए पूरा खर्चा ही नहीं दिया बल्कि रहने का इंतजाम भी महाराजा ने किया | और तो और जब बाबा साहब डा.  अम्बेडकर PHD करके वापस आये तो कोई भी उन्हें नौकरी नही दे रहा था, तब एक बार फिर महाराजा सयाजीराव गायकवाड़ ने उनका साथ दिया और उन्हें अपनी रियासत का महामंत्री नियुक्त किया और उस जमाने में उन्हें दस हजार रुपये महीने वेतन दिया जो आज दस करोड़ के बराबर है । लेकिन गाँव गाँव जो तथाकथित अम्बेडकरवादी घूमते हैं वो दलितों को ये बात नही बताते । वो तो छोड़िए उनका पूरा नाम भी बहुत कम लोग जानते है | इसी प्रकार डा. अम्बेड्कर के ब्राह्मण गुरु महादेव अंबेडकर ने ही दिया था उन्हे अम्बेड्कर उपनाम दिया | 1894 में भीमराव अंबेडकर जी के पिता सेवानिवृत्त हो गए और इसके दो साल बाद, अंबेडकर की मां भीमा बाई की मृत्यु हो गई | तो बाबा साहेब के १४ भाई बहनों की देखभाल उनकी चाची ने कठिन परिस्थितियों में रहते हुये की । रामजी सकपाल के केवल तीन बेटे, बलराम, आनंदराव और भीमराव और दो बेटियाँ मंजुला और तुलासा ही इन कठिन हालातों मे जीवित बच पाए। अपने भाइयों और बहनों मे केवल अंबेडकर ही स्कूल की परीक्षा में सफल हुए और इसके बाद बड़े स्कूल में जाने में सफल हुये। अपने एक देशस्थ  ब्राह्मण शिक्षक महादेव अंबेडकर जो उनसे विशेष स्नेह रखते थे के कहने पर अंबेडकर ने अपने नाम से सकपाल हटाकर अंबेडकर जोड़ लिया जो उनके गांव के नाम "अंबावडे" पर आधारित था। उनकी दूसरी पत्नी सविता अम्बेडकर भी ब्राह्मण थी |

Wednesday, 17 February 2016

                  “सिंधपति राजा दाहिर सैन”
सम्राट दाहिर सैन आठवीं शताब्दी के प्रारंभ में भारत के उत्तर पश्चिम के प्रसिद्ध ब्राह्मण राजा थे | उस समय के सिंधराज्य में आज का जम्मू कश्मीर, पंजाब, राजस्थान, और पाकिस्तान सहित अधिकांश उत्तर पश्चिम भारत शामिल था | दाहिर सेन के योग्य शासन से सिंधप्रान्त उन्नति और सुख शांति को प्राप्त था | अरब के मुस्लिम लुटेरो और आक्रान्ताओं को सिंध के वैभव से ईर्ष्या होने लगी | अत: सिंध को लूटने और इस्लामिकरण को व्याकुल रहने लगे | ऐसे में अरब के खलीफा ने सिंध और हिन्द के विरूद्ध जिहाद की घोषणा कर ने ७१२ ई में अपने भतीजे (जो उसका दामाद भी था) मोहम्मद बिन कासिम को विशाल सेना के साथ सिंध पर हमले के लिए भेजा | उसने कूटनीति का प्रयोग कर सिंध की बोद्ध आबादी को अहिंसा का वास्ता दे अपनी और कर लिया | बोद्धो ने यवनों को खाने पीने के सामान से लेकर धन और गुप्त सूचनाएं तक पहुंचाई | कासिम ने ‘देवल’ नामक बंदरगाह पर आक्रमण कर दाहिर की सेना को ललकारा | तो दोनों सेनाओं की मुटभेड़ ‘ब्राहमणाबाद’ के मैदान में हुई | अरबों की सेना के पास तोपें और ‘मजनोक’ नामक दुरमारक यंत्र भी था | इस युद्ध को हिन्दूवीर बहादुरी से लडे पर अपने ही लोगों की गद्दारी के चलते जीती बाजी हार गए | इसी समय दाहिर का हाथी बिगड़ गया और एक तीर दाहिर को लगा दाहिर घायल हो गए और 20 जून ७१२ ई. को ये वीर योद्धा रनभूमि में वीर गति को  प्राप्त हुआ | तब दाहिर की पत्नी ने भी महिलाओं और बची पुरुष सेना को साथ लेकर ‘रावर’ के किले से संघर्ष किया | जितना हो सकता था इस सेना ने मारकाट मचा दी | लेकिन हारी बाजी को जीत में परिवर्तित न करा सकी | अंततः बाजी अपने हाथ से जाते देख रानी को अपनी साथिनों के साथ जोहर करना पड़ा | सिंध पर कासिम का कब्ज़ा हो गया उसने मनमाने ढंग से लुटा और खुला धर्मान्तरण कर हिन्दुओं का मुसलमान किया |

           कासिम सिंध से हजारों हिन्दू बहन - बेटियों को जिनमे राजा दाहिर की दो युवा पुत्री सूरज और परमल भी थी, को दासी बना कर खलीफा को भेंट करने के लिए बगदाद ले गया | इनके शोर्य, बलिदान और बुद्धि चातुर्य की गाथा इतिहास प्रसिद्द है | दोनों बहनों को खलीफा के सामने पेश किया गया | चतुराई से दोनों बहनों ने खलीफा से कहा कि ‘आपके पास भेजने से पहले कासिम ने तो हमारा सतीत्व भंग कर दिया है तो क्या आप जूठन खाना पसंद करेंगे’ | यह सुन खलीफा आग बबूला हो गया और आदेश दिया की बैल की खाल में सिल कर कासिम को मेरे पास लाया जाये | आदेश का पालन हुआ और मोहम्मद बिन कासिम मारा गया | बाद में सूरज और परमल ने बताया की ‘कासिम तो निर्दोष था दरअसल हमने तो अपने पिता की हत्या और राज्य छिनने का बदला कासिम से लिया है’ | इतना कह दोनों बहनों ने तुरंत एक दुसरे को क़टार मार कर अपनी जीवन लीला समाप्त कर ली | और दुश्मन की धरती पर दुश्मन से बदला ले लिया | साथ ही अपना नाम इतिहास में अमर कर दिया | आगे चलकर पृथ्वीराज चौहान ने ११९२ ई. में दुश्मन की धरती पर दुश्मन से इसी तरह का बदला ||        

Thursday, 31 December 2015

सिलहट ----
भारत पाक विभाजन के समय सिलहट एकमात्र जिला ऐसा था जिसका निर्णय वोटों से हुआ की वह भारत में रहे या पाकिस्तान में | विभाजन पूर्व ये असम का एक जिला हुआ करता था | यहाँ हिन्दू मुस्लिम आबादी लगभग बराबर थी | इसीलिए हिन्दू नेता इसे भारत में और मुस्लिम नेता इसे पाकिस्तान में मिलाने की पैरोकारी कर रहे थे | पर विभाजन की चर्चा से आस पास के जिलों के बहुत बड़ी संख्या में हिन्दू सिलहट में आ बसे थे जिससे सिलहट स्पष्ट हिन्दू बहुमत वाला जिला बन गया | कोई निर्णय न होता देख अंतत:  मतदान कराने का निर्णय लिया गया | मतदान हुआ और हिन्दू भारी बहुमत होते हुए भी ५०००० मतों से हार गए | क्यों ? क्योकि हिन्दू मत डालने ही नहीं गए | मतदान वाले दिन हिन्दू ताश, शतरंज और उस प्रकार के अन्य खेलों में व्यस्त रहे | और जनमत हार गए | फिर सिलहट को पाक में जाना था सो चला गया | उसके बाद हिन्दुओं पर मुस्लिमों ने जमकर कहर बरपाया | लूट, हत्या, बलात्कार, धर्मांतरण आखिर हिन्दू के साथ क्या नहीं हुआ | जो उन्होंने झेला | अपनी जरासी गलती, मुर्खता और नासमझी के कारण हिन्दू सिलहट में अपने विनाश का कारण स्वयम बना |

ऐसे ही विभाजन से पूर्व कश्मीर में परावर्तित मुस्लिमो ने महाराजा गुलाब सिंह से घरवापसी के लिए कहा था | गुलाब सिंह ने कश्मीरी पंडितों से पूछा कि ये मुस्लिम जो किन्ही कारणों से इस्लाम कबूल कर चुके थे अब वापस अपने घर हिन्दू धर्म में आना चाहते है | तो पंडितों ने कहा था की हम सतलुज में कूद कर जान दे देगे पर इनकी घर वापसी स्वीकार नहीं करेंगें | और आप पर ब्राहमण हत्या का पाप लगेगा | क्योकि हिन्दू से जाने के बाद वापसी नहीं है और ये गोमांस खा चुके है | महाराजा गुलाबसिंह आने वाली परिस्थितियों से परिचित थे अत: वे काशी के ब्राह्मणों तक भी समाधान के लिए गए | पर काशी के ब्राहमणों ने भी वही कश्मीरी पंडितों वाला जवाब दिया कि हम गंगा में कूद कर जान दे देंगे | अंतत: गुलाब सिंह को हार मननी पड़ी और आज वही कश्मीरी पंडित ४-५ लाख की संख्या में कश्मीर छोड़ जम्मू दिल्ली की सडकों पर है और वे ही परावर्तित मुस्लिम आज कश्मीर के मालिक है |    

Wednesday, 9 December 2015

             “रामपुर तिराहा कांड”
१ अक्तूबर १९९४ -- मुजफ्फर नगर का रामपुर तिराहा भी कभी मुज्जफर नगर के कवाल कांड की तरह सुर्ख़ियों में था | और आज कवाल की तरह प्रशिद्ध एतिहासिक घटना के रूप में दर्ज है | दोनों घटनाओं के मैनेजर मुलायम सिंह है क्योंकि मुलायम सिंह लाशों की राजनीति में ही लाभ हानि देखते है | उत्तराखंड में एम वाई समीकरण नहीं चलता अत: उसमे कोई हानि नही थी इसलिए गोली चलवाने में देर नहीं की | स्थान भी दोनों घटनाओं का मुजफ्फर नगर है और समय भी लगभग सामान है तिराहा कांड १ अक्तूबर को व कवाल ७ सितम्बर को हुआ | हम रामपुर तिराहा कांड का पोस्ट मार्टम करके देखते है |
    १९९३ में मुलायम सिंह उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बने | स्वतन्त्र राज्य की मांग के चलते उत्तराखंडी २ अक्तूबर १९९४ को राजघाट गाँधी की समाधि पर धरना देने जा रहे थे | मुलायम ने उन्हें दिल्ली न पहुचने देने की कसम खा रखी थी | अत: गेम रामपुर तिराहा (मुजफ्फर नगर) पर सजाया गया था | निर्दोष निहत्थे उत्तराखंडियों पर बिना किसी उत्तेजना के अंधाधुंध गोली बरसा दी गई | सैंकड़ो लोग घायल हुए और ७ लोग मारे गए महिलाओं के साथ बलात्कार, छेड़छाड़ और अश्लील हरकते हुई नंगी ओरतों को भाग कर गन्ने के खेतो में जान बचानी पड़ी | सरकार ने छपार थाने में उत्तराखंडियों पर फर्जी मुक़दमें दायर कर दिए |

    इलाहबाद हाईकोर्ट सख्त हुआ जनवरी १९९५ में सीबीआई को जांच दी गई | इस मामले में ५ वरिष्ठ अधिकारी सहित छपार, खतौली, झिंझाना व मुजफ्फर नगर के थानाध्यक्षो सहित १५ -२० अन्य पुलिसकर्मीयों पर सीबीआई ने मुक़दमे दायर हुए | इनको लाश छिपाने, शस्त्र बरामदगी और हेराफेरी जैसे संगीन फर्जी मुकदमे दायर करने का दोषी पाया गया था | जिला चिकित्सा अधिकारी ने उत्तराखंडीयों की और से फायरिंग दिखाने के लिए पुलिसकर्मीयों के शारीर में ओपरेशन कर छर्रे घुसा दिए थे |  उस समय मुलायम सिंह ने कहा था सब फर्जी है यदि एक भी बलात्कार साबित हो गया तो राजनीती से सन्यास ले लूँगा | बाद में ३८ महिलाओं के साथ पुलिसकर्मियों के द्वारा बलात्कार के मामले सामने आये और मुक़दमे दायर हुए | ये मुलायम सिंह डाला सिमेंट फैक्ट्री में अपने चहेते उद्धोगपति को कब्ज़ा दिलाने के लिए फैक्ट्री घेरे बैठे निर्दोष मजदूरो पर भी महोदय गोली चलवा चुके है | अयोध्या गोलीकांड से कौन परिचित नहीं है | १९९९ में बाजपेयी सरकार ने नए उत्तराखंड राज्य का गठन किया |

                   “पद्मनाभं मंदिर का खजाना खतरे में”
ये तो आप जानते है कि केरल के तिरुअन्तपुरम स्थित भगवान पद्मनाभ स्वामी (विष्णु भगवान) का मंदिर अकूत सम्पदा जो लगभग एक लाख करोड के आस पास मानी जाती है, का स्वामी है | इस पर केरल सरकार कि गिद्ध दृष्टि है | ये वो संपत्ति है जिसे हिन्दू सदियों से अपने इष्ट भगवन विष्णु को श्रधा पूर्वक चढ़ाता आ रहा है | जिसका हाल ही में खुलादा हुआ था | सुप्रीम कोर्ट ने अपनी देख रेख में इस संपत्ति की जांच और मूल्याङ्कन करने का कार्य शुरू किया | सुप्रीम कोर्ट ने ये भी कहा की ये संपत्ति मंदिर और उस राजपरिवार की है जिसने इसे बनवाया था | इस सम्पदा के मंदिर से गायब होने कि आशंका प्रबल हो गयी है | ये आशंका न्यायालय कि सहायता हेतु नियुक्त अधिवक्ता गोपाल सुब्रह्मण्यम ने अपनी ३५ दिनी जांच के बाद उच्चतम न्यायालय को दी रिपोर्ट में कि है |

दरअसल इस भारी खजाने का पता जुलाई २०११ में लगा था | तब इसकी जांच को उच्चतम न्यायालय ने ही मूल्यांकन का काम अधिवक्ता गोपाल सुब्रह्मण्यम को सौंपा था | मंदिर प्रांगण में गोल्ड प्लेटिंग मशीन के मिलने से खजाना गायब होने कि शंका को और बल मिलता है | मशीन के माध्यम से असली स्वर्ण आभूषणों को या तो गायब कर दिया या नकली में बदल दिया गया | अभी तक ६ तहखानो ‘ए’ से ‘एफ’ तक के खजानों कि जांच कि जा चुकी है | गोपाल सुब्रह्मण्यम के अनुसार दो तहखाने ‘जी’ और ‘एच’ के भी होने और उनके खोलने कि भी मांग अधिवक्ता ने कि है, जिसका काफी विरोध हुआ | गोपाल सुब्रह्मण्यम ने मंदिर के खातों में भी गडबडियाँ पायीं जिनकी जांच पूर्व नियंत्रक एवं रक्षा लेखा परीक्षक से कराने कि मांग कि है | इनके आलावा ३० साल से दानदाताओं के दिए पैसे कि भी गिनती नहीं हुयी है | महत्वपूर्ण बात ये है कि केरल सरकार को मंदिर अपने हाथ में लेने वाले केरल उच्च न्यायालय के निर्णय पर सर्वोच्च न्यायालय ने रोक लगा रखी है | यहाँ ये बताना भी आवश्यक है कि मंदिर त्रावनकोर राजपरिवार के कुल देवता पद्मनाभ स्वामी का है तथा राजपरिवार ने अपना पूरा साम्राज्य भगवान को समर्पित कर दिया था ||

                       “काली नदी-प्रागैतिहासिक भागीरथी”
सभी प्राचीन सभ्यताए नदियों के ही किनारे पुष्पित पल्लवित हुई है | इसका प्रमुख कारण है की उस समय जल मार्ग ही आवागमन के प्रमुख साधन हुआ करते थे | सरस्वती, सिन्धु, नील नदी की सभ्यताए इसका उदहारण है | लन्दन टेम्स और मास्को मस्कवा नदी के तट पर बसे है |  मोहन्जोंदाडो,लोथल, हड़प्पा सभ्यता सरस्वती नदी के किनारे विकसित हुईं ओर नदी के साथ ही समाप्त हो गयी | त्रेता युग में मेरठ को मय दानव द्वारा मयराष्ट्र के रूप में हेमा के कारण इंद्र से छुपकर मायावी नगरी के रूप में बसाया गया था | जो उस समय की पूर्ण विस्तृत काली नदी के पश्चिम मुहाने पर बसा था | तब ये नगर से सट कर बहती थी यहाँ अब वर्तमान में कचहरी है | काली नदी की बार बार की बाढ़ की तबाही से बचने के लिए अंग्रेजो ने इसे खुदवाकर नगर से  १० किलोमीटर दूर पूरब में वर्तमान स्थान पर पहुचाया था | अब भी यदि कभी बाढ़ की स्थिति आती है जैसा की १९६२ व १९७८ में देखने को मिली, तो ये नदी अपने पूर्व मूल मार्ग पर ही नगर से सटकर बहने लगती है और १ से दो किमी का विस्तार कर लेती है | जो उपरोक्त बात की पुष्टि करता है | मेरठ के उत्तर में व रुड़की रोड के १-१.५ किमी पूरब में  सोफिपुर, गुरुकुल डोरली, पल्हैडा के पूरब के जंगल को आज भी ग्रामवासी नदी कहकर पुकारते हैं | इस क्षेत्र में आज भी ६ से १० फूट नीचे बालुका पट्टी मिलती है | गत दिनों कचहरी परिसर में भी “तेरह न्यायालय कोर्ट” के निर्माण के समय भी १० फिट मोटी बालुका पट्टी मिली थी | लावड मार्ग पर काली नदी के पुल के ऊपर खड़े होकर मेरठ की और देखने से साफ़ दिखता है की नदी को पूरब की और खोदकर मोड़ा गया है | इसी क्षेत्र के गांव खानोदा के एक बुजुर्ग शाहबुद्दीन का कहना है की “हमारे दादा परदादा ने काली नदी की खुदाई में दो पैसा रोज पर मजदूरी की थी |”
काली नदी की प्राचीनता का प्रमाण हमें ‘बाल्मीकि रामायण’ के अयोध्या कांड के सर्ग ७१ में भी देखने को मिलाता है | जिसके अनुसार महाराजा दसरथ के मरणोपरांत जब भरत अपने ननिहाल कैकेय देश की राजधानी गिरिव्रज से अयोध्या लौट रहे थे तो मार्ग में पड़ने वाले नदी और प्रदेशो का जिक्र रामायण में आया है |  इस यात्रा में यमुना के पूरब में भागीरथी और फिर गंगा का जिक्र है, यानि यमुना –गंगा के बीच एक विशाल भागीरथी नदी (काली नदी) थी ­–
    “यमुना प्राप्य संतिर्नोबलम माश्वास यत्तदा, भागीरथीम दुश्प्रतराम सोशुधाने महानदीम | ७१\६
      उपायाद्राघव स्तुर्नम प्राग्वटे विश्रुते पुरे, स गंगा प्राग्वटे तीर्त्वा समायात कुटि कोष्ठिकाम | ७१\९
 (यमुना पार करके सेना को विश्राम दिलाया, फिर दुश्प्रतरा (कठिनाई से पार करने योग्य) भागीरथी महानदी को पार करके प्राग्वट में गंगा नदी को पार किया) | उत्तरीय मत्स्य देश को पार करके भरत यमुना किनारे पहुंचे थे |
   प्राग्वट की स्थिति फतेहगढ़ के समीप बताई जाती है | इस प्रकार रामायण कालीन भागीरथी ही वर्तमान काली नदी है | मानचित्र में भागीरथी गंगोत्री से निकलकर कुछ दूर पश्चिम को चलकर दक्षिण को बहती है | टिहरी जनपद में अपना प्रवाह पूर्व को लेकर रूद्र प्रयाग में अलकनंदा से संगम करती हुई तथा मार्ग में पड़ने वाली पहाड़ी नदियों को अपने में आत्मसात करती हुई गंगा का रूप लेती है | मानचित्र पर ध्यान देने से प्रतीत होता है की भागीराथी का सीधा प्रवाह दक्षिण भारत की और था | किसी भोगोलिक विक्षोभ के कारन यह पूर्व को मुड कर अलकनंदा में जा मिली | और बीच में ये प्रवाह लुप्त होकर मुजफ्फरनगर जिले की जानसठ तहसील के गाँव अन्तवाडा में यह श्रोत पुन: फूट पड़ा, और आगे बढ़ता हुआ मेरठ, बुलंदशहर में बड़ी काली नदी का रूप  ले ले लिया | मेरठ नगर के पास काली नदी का प्रवाह गुरुकुल डोरली के पास से होता हुआ, कचहरी और फिर पुरानी तहसील के पूर्व की और से था | १९६७ में पल्हैडा के जंगल में एक ट्युबैल के बोरिंग के समय ८०-१०० फूट नीचे नाव की लकड़ी के टूकडे,जो कोयले का रूप धारण कर रहे थे, मिले थे | लकड़ी को इस स्थिति में आने में लाखों साल लगते है |

          (स्वतंत्रता सेनानी रत्नाकर शास्त्री का काली नदी पर शोध परक लेख, ये मेरठ के पल्हैडा निवासी और        रामायण के विद्वान् थे)